ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे संगठित अपराध गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो पिछले कई वर्षों से ट्रैफिक पुलिसकर्मियों और सरकारी कर्मचारियों को निशाना बनाकर करोड़ों रुपये की उगाही कर रहा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने मकोका (MCOCA) के तहत कार्रवाई करते हुए अदालत में 3,000 से अधिक पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। जांच में सामने आया है कि गिरोह ने ब्लैकमेलिंग, धमकी और फर्जी शिकायतों के जरिए बड़ी मात्रा में अवैध संपत्ति अर्जित की थी।
कैसे काम करता था गिरोह?
पुलिस के अनुसार इस गिरोह का सरगना राजकुमार उर्फ राजू मीणा है, जो वर्ष 2015 से इस तरह की गतिविधियों में शामिल था। गिरोह के सदस्य सड़क पर ड्यूटी कर रहे ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को अपने जाल में फंसाते थे। वे पहले चालान से बचने के लिए मामूली रकम देने की पेशकश करते थे। यदि कोई पुलिसकर्मी उनकी बातों में आ जाता, तो गिरोह के सदस्य छिपे हुए कैमरों या मोबाइल फोन से पूरी घटना रिकॉर्ड कर लेते थे। इसके बाद वीडियो को इस तरह एडिट किया जाता था कि ऐसा लगे जैसे संबंधित पुलिसकर्मी रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया हो।
वीडियो बनाकर करते थे ब्लैकमेल
जांच में पता चला कि वीडियो रिकॉर्डिंग के बाद पुलिसकर्मियों को फोन कर धमकाया जाता था। उनसे कहा जाता था कि यदि पैसे नहीं दिए गए तो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाएगा या विभागीय अधिकारियों को भेज दिया जाएगा। गिरोह का डर इतना था कि कई पुलिसकर्मी और सरकारी कर्मचारी बदनामी तथा नौकरी पर खतरे के डर से समझौते के लिए मजबूर हो जाते थे। पुलिस का दावा है कि इसी तरीके से वर्षों तक करोड़ों रुपये की उगाही की गई।
सरकारी कर्मचारियों को भी बनाया निशाना
क्राइम ब्रांच की जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह केवल ट्रैफिक पुलिस तक सीमित नहीं था। विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मचारियों और अधिकारियों को भी इसी तरह ब्लैकमेल किया जाता था। झूठी शिकायतों और सोशल मीडिया पर बदनाम करने की धमकी देकर उनसे पैसे वसूले जाते थे। पुलिस का मानना है कि इस नेटवर्क का दायरा काफी बड़ा था और कई लोग इसके शिकार बने।
अवैध स्टिकर नेटवर्क से भी होती थी कमाई
जांच के दौरान एक और बड़ा खुलासा हुआ। पुलिस के मुताबिक गिरोह कथित तौर पर एक अवैध "मार्का" या स्टिकर नेटवर्क भी संचालित कर रहा था। आरोप है कि कमर्शियल वाहन चालकों से नियमित रूप से पैसे वसूले जाते थे और बदले में उन्हें कार्रवाई से बचाने का आश्वासन दिया जाता था। इस नेटवर्क से भी गिरोह को बड़ी आर्थिक कमाई होती थी।
10 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का खुलासा
जब पुलिस ने गिरोह के आर्थिक लेन-देन और संपत्तियों की जांच की तो कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं। जांच में मकान, दुकानें, प्लॉट, बैंक खातों में जमा रकम और कई वाहनों का पता चला। पुलिस के अनुसार इन संपत्तियों का कुल बाजार मूल्य 10 करोड़ रुपये से अधिक है। कई संपत्तियां आरोपियों के नाम पर न होकर उनके रिश्तेदारों और करीबी सहयोगियों के नाम पर खरीदी गई थीं।
गैंग की कमाई से खरीदी गई संपत्तियां
इस मामले में राजू मीणा की पत्नी सुरेखा रानी को भी गिरफ्तार किया गया है। सुरेखा पेशे से वकील हैं और कड़कड़डूमा कोर्ट में प्रैक्टिस करती हैं। पुलिस का आरोप है कि अपराध से अर्जित धन से खरीदी गई कई संपत्तियां उनके नाम पर थीं। इसलिए उन्हें भी मामले में आरोपी बनाया गया है और उनसे पूछताछ जारी है।
जांच अभी भी जारी
अब तक पुलिस इस मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। इनमें राजू मीणा, मुकेश उर्फ पकौड़ी, संजय गुप्ता, जीशान अली और सुरेखा रानी शामिल हैं। क्राइम ब्रांच का कहना है कि डिजिटल साक्ष्य, बैंक रिकॉर्ड, संपत्ति दस्तावेज और गवाहों के बयान के आधार पर विस्तृत चार्जशीट तैयार की गई है। हालांकि मामले में अभी जांच जारी है और पुलिस गिरोह से जुड़े अन्य लोगों तथा छिपाई गई संपत्तियों की तलाश कर रही है।
यह मामला दिखाता है कि किस तरह संगठित अपराधी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को ब्लैकमेल कर बड़े पैमाने पर अवैध कमाई कर रहे थे। अब अदालत में चलने वाली कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!