गिनी-बिसाऊ में सैन्य तख्तापलट: सेना ने सत्ता संभाली, राष्ट्रपति लापता – क्या चल रहा है इस छोटे देश में?
पश्चिम अफ्रीका के छोटे देश गिनी-बिसाऊ में सेना ने अचानक सत्ता अपने हाथ में ले ली, सीमाएं बंद कर दीं और चुनावी प्रक्रिया रोक दी। राष्ट्रपति के लापता होने की खबर है। जानिए पूरा संकट, पृष्ठभूमि और इसके असर के बारे में।
गिनी-बिसाऊ में सैन्य तख्तापलट: सेना ने सत्ता संभाली, राष्ट्रपति लापता – क्या चल रहा है इस छोटे देश में?
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गिनी-बिसाऊ: एक छोटा देश, बड़ा राजनीतिक भूचाल

पश्चिम अफ्रीका का छोटा सा देश गिनी-बिसाऊ आमतौर पर भारतीय खबरों में कम ही आता है, लेकिन इस बार यहां हुए सैन्य तख्तापलट ने दुनिया का ध्यान खींच लिया है। बुधवार 26 नवंबर 2025 को राजधानी बिसाऊ अचानक गोलियों की आवाज से दहल उठी और कुछ ही समय बाद सेना ने घोषणा कर दी कि देश की कमान अब उसके हाथ में है।

सेना ने न सिर्फ सरकार को हटाने की बात कही, बल्कि देश की सभी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बंद करने और चुनाव संबंधी सभी प्रक्रियाओं को रोकने का भी ऐलान कर दिया। इससे साफ हो गया कि यह सिर्फ मामूली झड़प नहीं, बल्कि पूरा सैन्य तख्तापलट है।

क्या हुआ 26 नवंबर को?

रिपोर्टों के मुताबिक, बिसाऊ शहर में दोपहर के समय अचानक तेज फायरिंग और गोलाबारी की आवाजें सुनाई देने लगीं, जिससे आम लोग डर के मारे घरों में बंद हो गए। थोड़ी ही देर बाद सेना से जुड़े अधिकारियों ने मीडिया के ज़रिए ये संदेश दिया कि उन्होंने देश की सत्ता अपने हाथों में ले ली है।

इसके बाद आधिकारिक रूप से यह भी बताया गया कि देश की सीमाएं फिलहाल बंद रहेंगी और किसी भी तरह की चुनावी गतिविधि पर रोक लगा दी गई है। इसका मतलब है कि जो राजनीतिक प्रक्रिया चल रही थी, उसे अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दिया गया है।

राष्ट्रपति कहां हैं? लापता होने के दावे

सबसे बड़ा सवाल देश के राष्ट्रपति की स्थिति को लेकर है, जिनके बारे में “लापता” होने की खबरें आ रही हैं। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वे सेना की हिरासत में हैं, किसी सुरक्षित जगह पर हैं या देश छोड़ चुके हैं।

किसी भी देश में सैन्य तख्तापलट के दौरान सबसे पहले निशाना राजनीतिक नेतृत्व पर ही होता है, इसलिए राष्ट्रपति का “नजरों से गायब” हो जाना चिंता बढ़ा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इसी बात पर पैनी नज़र रखे हुए है कि असल में राष्ट्रपति के साथ क्या हुआ।

सीमाएं बंद और चुनाव प्रक्रिया पर रोक

सेना की ओर से लिए गए दो बड़े फैसले—सीमाएं बंद करना और चुनाव रोकना—आम नागरिकों और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों के लिए झटका हैं। सीमाएं बंद होने से लोगों की आवाजाही, व्यापार, दवाइयों और जरूरी सामान की सप्लाई पर असर पड़ सकता है।

इसी तरह, चुनावी प्रक्रिया पर रोक का मतलब है कि इस समय देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था ठहर गई है और पूरा नियंत्रण सैन्य नेतृत्व के हाथ में चला गया है। आगे चलकर यह सवाल उठेगा कि क्या सेना जल्द चुनाव कराएगी या लंबे समय तक खुद ही सत्ता में रहने की कोशिश करेगी।

गिनी-बिसाऊ में तख्तापलट की पृष्ठभूमि

गिनी-बिसाऊ का इतिहास राजनीतिक अस्थिरता से भरा हुआ है, जहां पहले भी सैन्य हस्तक्षेप, बगावत और अस्थिर सरकारें देखी गई हैं। यह देश आर्थिक रूप से कमजोर है और नशीले पदार्थों की तस्करी के रूट के रूप में भी कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में सामने आता रहा है, जिससे आंतरिक राजनीति और भी जटिल हो जाती है।

ऐसे देशों में सेना अक्सर खुद को “स्थिरता लाने वाली ताकत” बताकर सत्ता पर कब्जा कर लेती है, जबकि असल में इससे लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को बड़ा नुकसान होता है।

आम लोगों पर तख्तापलट का असर

जब भी किसी देश में अचानक सैन्य तख्तापलट होता है, सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को ही झेलना पड़ता है। फौजी टैंकों, बंदूकों और कर्फ्यू के बीच सामान्य जिंदगी ठप हो जाती है, स्कूल-कॉलेज बंद हो जाते हैं और बाजारों में भी डर बना रहता है।

सीमाएं बंद होने से बाहर काम करने गए लोग, स्टूडेंट्स या बीमारियां से जूझ रहे मरीज, जो दूसरे देशों में इलाज के लिए जाना चाहते हैं, सब फंस जाते हैं। इसके अलावा, अगर तख्तापलट के बाद किसी तरह की हिंसा भड़कती है तो शरणार्थियों का संकट भी पैदा हो सकता है।

पश्चिम अफ्रीका के लिए क्या मैसेज?

हाल के सालों में पश्चिम अफ्रीका के कई देशों—जैसे माली, नाइजर, बुर्किना फासो आदि—में सैन्य तख्तापलट देखने को मिले हैं, जिससे पूरा इलाका अस्थिर हो गया है। गिनी-बिसाऊ में भी ऐसा ही कदम यह दिखाता है कि क्षेत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

अगर एक के बाद एक देश में सेना सत्ता संभालती रही, तो क्षेत्रीय संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है, नहीं तो यह “सैन्य तख्तापलट की लहर” लंबी चल सकती है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और आगे का रास्ता

अब निगाहें इस बात पर होंगी कि अफ्रीकी यूनियन, संयुक्त राष्ट्र और बड़े देशों की प्रतिक्रिया क्या रहती है। आम तौर पर ऐसे मामलों में वे लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने और राजनीतिक संवाद शुरू करने की अपील करते हैं, साथ ही पाबंदियों और आर्थिक दबाव का विकल्प भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

गिनी-बिसाऊ में शांति, स्थिरता और लोकतंत्र लौटाने के लिए जरूरी होगा कि सेना और राजनीतिक दल किसी बातचीत की मेज पर आएं और जनता को भी भरोसे में लिया जाए। फिलहाल, राष्ट्रपति का पता लगना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे पहली जरूरत है।

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