ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद भारत ने आधिकारिक तौर पर शोक जताया है। 5 मार्च को विदेश सचिव विक्रम मिसरी नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास पहुंचे और वहां शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस कदम को भारत की ओर से एक औपचारिक और कूटनीतिक संदेश के रूप में देखा गया, लेकिन देश के अंदर इस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेजी से सामने आई।
भारत का आधिकारिक रुख
विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने भारत सरकार की ओर से ईरान के दिवंगत नेता के निधन पर संवेदना जताई। उनका ईरानी दूतावास पहुंचना यह दिखाता है कि भारत ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लिया और औपचारिक स्तर पर अपना शोक दर्ज कराया। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में ऐसे कदम सिर्फ संवेदना नहीं होते, बल्कि वे यह भी बताते हैं कि दो देशों के संबंध कितने संवेदनशील और अहम हैं।
ईरान भारत के लिए सिर्फ एक पश्चिम एशियाई देश नहीं है। ऊर्जा, क्षेत्रीय स्थिरता और रणनीतिक संतुलन जैसे कई मुद्दों पर उसका महत्व माना जाता है। इसलिए वहां के सर्वोच्च नेता की मौत पर भारत की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से ध्यान खींचने वाली थी।
कांग्रेस ने क्या कहा
इस बीच कांग्रेस की तरफ से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। कांग्रेस नेता शुभंकर सरकार ने कहा कि सरकार की डिप्लोमेसी फेल हो चुकी है और जब उसकी किरकिरी होने लगी, तब जाकर शोक सभा में प्रतिनिधि भेजा गया। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने अपना रुख पहले ही साफ कर दिया था।
यानी एक अंतरराष्ट्रीय घटना पर संवेदना जताने का मामला भी देश के अंदर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया। ऐसा अक्सर होता है, क्योंकि विदेश नीति के सवालों पर भी अब घरेलू राजनीति का असर साफ दिखने लगा है। कौन पहले बोला, किसने कितना कड़ा रुख लिया, किसने देर की—इन सब बातों पर राजनीतिक दल अपनी-अपनी लाइन खींचने लगते हैं।
खामेनेई की मौत और उसके बाद के हालात
रिपोर्ट के मुताबिक अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत 28 फरवरी को अमेरिकी-इजरायली संयुक्त सैन्य कार्रवाई में हुई थी। इस अभियान को “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया गया था। उनके निधन के बाद ईरान में 40 दिन के शोक की घोषणा की गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके मारे जाने की घोषणा की थी, जिसके बाद ईरान की सरकारी मीडिया ने भी इसकी पुष्टि की।
यह पूरा घटनाक्रम अपने आप में असाधारण रहा, क्योंकि इतने बड़े धार्मिक और राजनीतिक चेहरे की मौत ने पूरे पश्चिम एशिया की दिशा को प्रभावित करने वाले सवाल खड़े कर दिए। ऐसे समय में भारत जैसे देश का कोई भी आधिकारिक कदम बहुत गौर से देखा जाता है।
अंतिम संस्कार में देरी ने बढ़ाए सवाल
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खामेनेई को अब तक सुपुर्द-ए-खाक नहीं किया गया है और शोक समारोह को आखिरी समय पर टाल दिया गया। आधिकारिक तौर पर तैयारियों का हवाला दिया गया, लेकिन अंतिम संस्कार में देरी को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। उनके पार्थिव शरीर को तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला में रखने की तैयारी बताई गई है, जो बड़े धार्मिक और राष्ट्रीय आयोजनों की जगह मानी जाती है।
यह देरी सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं लगती, बल्कि इससे यह भी संकेत मिलता है कि ईरान के भीतर हालात बेहद संवेदनशील हैं। ऐसे समय में हर प्रतीकात्मक कदम का अपना महत्व होता है—चाहे वह शोक की अवधि हो, श्रद्धांजलि का तरीका हो या अंतिम संस्कार की व्यवस्था।
भारत के सामने संतुलन की चुनौती
भारत के लिए चुनौती यही रहती है कि वह संवेदना भी जताए और अपने रणनीतिक हितों का संतुलन भी बनाए रखे। इस मामले में आधिकारिक शोक और घरेलू राजनीतिक प्रतिक्रिया, दोनों साथ-साथ चलती दिखीं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि भारत ईरान से जुड़े मुद्दों पर कितनी सावधानी और कितनी स्पष्टता के साथ आगे बढ़ता है।
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