भारत–EU फ्री ट्रेड डील: “मदर ऑफ ऑल डील्स” के बाद अमेरिका क्यों बेचैन?​
भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक FTA हुआ है जिसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। अमेरिका में बेचैनी क्यों है, टैरिफ और रूसी तेल को लेकर क्या कहा गया—पूरी रिपोर्ट पढ़ें।​
भारत–EU फ्री ट्रेड डील: “मदर ऑफ ऑल डील्स” के बाद अमेरिका क्यों बेचैन?​
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भारत और यूरोपीय संघ के बीच एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता हुआ है, जिसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है।

यह करार ऐसे दो बड़े आर्थिक समूहों के बीच हुआ है जिनकी संयुक्त हिस्सेदारी दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में लगभग 25% बताई गई है।
यह समझौता नई दिल्ली में हुआ और इसे भारत के लिए आर्थिक के साथ-साथ भू-राजनीतिक स्तर पर भी बड़ी सफलता माना गया है।
सरल शब्दों में कहें तो भारत को अब यूरोप के बाजारों तक पहुंच पहले से बेहतर मिलने वाली है, और यही बात इस डील को खास बनाती है।

यह समझौता “ऐतिहासिक” क्यों कहा जा रहा है

बताया गया है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस मुक्त व्यापार समझौते पर कई वर्षों से बातचीत चल रही थी।
इस डील से भारत को यूरोपीय बाजारों तक बेहतर एक्सेस मिलने की उम्मीद है, जिससे निर्यात बढ़ने, विदेशी निवेश आने और रोजगार के नए मौके बनने की बात कही गई है।​ यूरोपीय संघ पहले से ही भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, इसलिए यह समझौता दोनों पक्षों के लिए काफी मायने रखता है।​ रिपोर्ट के अनुसार यह करार व्यापारिक शुल्क कम करने, सप्लाई चेन मजबूत करने और तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग व ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने में मदद करेगा।

आज की दुनिया में सिर्फ सामान बेचने-खरीदने से बात पूरी नहीं होती; मजबूत सप्लाई चेन, नई टेक्नोलॉजी और ऊर्जा के नए रास्ते भी उतने ही जरूरी हैं। इसी वजह से कई लोग इसे सिर्फ ट्रेड डील नहीं, बल्कि लंबे समय की आर्थिक साझेदारी के रूप में भी देख रहे हैं।

अमेरिका में बेचैनी की वजह क्या है

यह डील ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% तक टैरिफ लगाकर दबाव बनाने की कोशिश की है।
इसी माहौल में भारत का यूरोपीय संघ के साथ इतना बड़ा समझौता करना यह संकेत देता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपने विकल्प खुद तय कर रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक इस करार के बाद अमेरिका में बेचैनी साफ तौर पर देखी जा रही है।

टैरिफ का मतलब आम भाषा में यही है कि किसी देश के सामान पर ज्यादा टैक्स लगाकर उसे महंगा कर दिया जाए, ताकि व्यापार पर दबाव बने।
ऐसे में अगर भारत को दूसरे बड़े बाजारों से बेहतर रास्ता मिल जाए, तो अमेरिका की रणनीति अपने आप कमजोर पड़ सकती है—और यही चिंता की एक बड़ी वजह मानी जा रही है।

टैरिफ में राहत नहीं”—अमेरिकी संदेश

भारत–EU समझौते के बाद अमेरिका की प्रतिक्रिया सख्त बताई गई है।
ट्रंप प्रशासन के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा है कि भारत को अमेरिका की ओर से टैरिफ में फिलहाल कोई राहत नहीं मिलने वाली है।
फॉक्स बिजनेस को दिए इंटरव्यू में ग्रीर ने यह भी कहा कि रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की चिंताएं अभी खत्म नहीं हुई हैं।
उनके मुताबिक भारत ने रूसी तेल की खरीद में कुछ कमी जरूर की है, लेकिन पूरी तरह इससे अलग होना अभी संभव नहीं है।
ग्रीर ने यह भी कहा कि रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद है, इसलिए इस सप्लाई को तुरंत छोड़ना आसान नहीं है।

यहां भारत की मजबूरी भी समझ आती है और अमेरिका का दबाव भी।
ऊर्जा जरूरतें हर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती हैं, और जब तेल सस्ता मिले तो कोई भी देश तुरंत विकल्प बदलने में हिचकता है।

रूसी तेल पर अमेरिका का रुख बदलता दिखा

जेमिसन ग्रीर का बयान अमेरिका के पहले के बयानों से अलग बताया गया है।
इससे पहले ट्रंप प्रशासन की ओर से कहा गया था कि भारत ने रूस से तेल खरीद लगभग बंद कर दी है, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस तरह के बयान दे चुके हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दावोस इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया था कि भविष्य में भारतीय उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ में कुछ राहत मिल सकती है।
लेकिन अब ग्रीर के ताजा बयान से यह संदेश निकलता है कि अमेरिका फिलहाल भारत पर दबाव बनाए रखना चाहता है।

कूटनीति में शब्द बहुत मायने रखते हैं, क्योंकि एक-एक लाइन से बाजारों और देशों के रिश्तों का टोन तय होता है।
इसी कारण भारत–EU डील के बाद अमेरिका के अलग-अलग संकेतों पर लोगों की नजर टिकी हुई है कि आगे दिशा क्या होगी।

भारत के लिए यह डील किस तरह फायदेमंद हो सकती है

रिपोर्ट के मुताबिक इस समझौते से भारत को यूरोपीय बाजारों तक बेहतर पहुंच मिलेगी और निर्यात बढ़ने की उम्मीद है।
इसी के साथ विदेशी निवेश और रोजगार के नए अवसर बनने की बात भी कही गई है।
यह डील सप्लाई चेन मजबूत करने और तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग व ग्रीन एनर्जी में सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी मदद कर सकती है।
विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि इससे भारत को चीन पर निर्भरता कम करने और खुद को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने में मदद मिल सकती है।

आम लोगों के लिए इसका सीधा मतलब यह हो सकता है कि आने वाले समय में ज्यादा कंपनियां भारत में निवेश करें, उत्पादन बढ़े और कुछ सेक्टर में नौकरियों के मौके बनें।
हालांकि असली असर समय के साथ दिखेगा, क्योंकि डील के नियम जमीन पर लागू होने में वक्त लगता है।

आगे की राह: मौके भी, चुनौती भी

यह डील भारत के लिए एक बड़ा मौका है, लेकिन इसके साथ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी क्योंकि बाजार खुलने पर दोनों तरफ की कंपनियां आमने-सामने आती हैं।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका टैरिफ और रूसी तेल के मुद्दे पर अपना दबाव बढ़ाएगा या बातचीत का रास्ता निकलेगा।
इतना तय है कि भारत–यूरोपीय संघ का यह समझौता आने वाले महीनों में ग्लोबल ट्रेड और राजनीति—दोनों में बड़ी चर्चा का विषय बना रहेगा।

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