ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दुनिया आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीकों के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी देशों में शामिल जापान भी लगातार नए आविष्कारों और विकास के लिए जाना जाता है। लेकिन इस चमकदार तकनीकी प्रगति के पीछे एक गंभीर समस्या तेजी से बढ़ रही है—जनसंख्या में लगातार गिरावट। ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच जापान की आबादी में करीब 31 लाख लोगों की कमी आई है। यह गिरावट देश के इतिहास में सबसे बड़ी जनसंख्या गिरावटों में से एक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दशकों में इसका सीधा असर जापान की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था पर पड़ेगा।
घटती जन्मदर बनी सबसे बड़ी वजह
जापान में जनसंख्या संकट की शुरुआत कई दशक पहले हो चुकी थी। 1970 के दशक में पहली बार सरकार का ध्यान इस ओर गया जब देश का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) 2.1 से नीचे चला गया। किसी भी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए औसतन 2.1 बच्चों का जन्म प्रति दंपति आवश्यक माना जाता है। लेकिन जापान में यह आंकड़ा घटकर लगभग 1.1 तक पहुंच गया है। इसका मतलब यह है कि जितनी तेजी से लोग बुजुर्ग हो रहे हैं और उनकी मृत्यु हो रही है, उतनी संख्या में नए बच्चों का जन्म नहीं हो रहा।
शादी और परिवार से दूर हो रहे युवा
जनसंख्या में गिरावट का एक बड़ा कारण युवाओं का शादी और परिवार से दूर होना भी है। 1970 के दशक में जापान में हर साल करीब 10 लाख शादियां होती थीं, लेकिन 2023 तक यह संख्या घटकर लगभग 5 लाख रह गई। इसके अलावा पहले बच्चे को जन्म देने की औसत उम्र भी बढ़ गई है। जहां पहले महिलाएं करीब 25 वर्ष की उम्र में मां बनती थीं, वहीं अब यह औसत 31 वर्ष तक पहुंच चुका है। बढ़ती महंगाई, करियर का दबाव और शहरी जीवन की चुनौतियों के कारण युवा परिवार बढ़ाने से बच रहे हैं।
गांव खाली, शहरों में बढ़ रही भीड़
जापान के कई ग्रामीण इलाकों में जनसंख्या तेजी से घट रही है। विशेष रूप से उत्तरी क्षेत्रों जैसे अकिता और आओमोरी में आबादी में लगभग 8 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवा टोक्यो, ओसाका और अन्य बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि गांवों और छोटे कस्बों में केवल बुजुर्ग आबादी बच रही है।
कई जगहों पर स्कूलों को बंद करना पड़ा है या उन्हें नर्सिंग होम और सामुदायिक केंद्रों में बदल दिया गया है क्योंकि वहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बेहद कम हो चुकी है। लाखों घर खाली पड़े हैं और स्थानीय प्रशासनिक कार्यालय भी छोटे होते जा रहे हैं।
अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जनसंख्या में गिरावट जारी रही तो जापान की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या कम होने से उद्योगों और व्यवसायों को श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ेगा। दूसरी ओर बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर सरकारी खर्च लगातार बढ़ेगा। इससे आर्थिक संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
क्या है समाधान?
जापान की सरकार पिछले कई वर्षों से जन्मदर बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है, लेकिन अब तक अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं। विशेषज्ञों के अनुसार केवल आर्थिक सहायता से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इमिग्रेशन यानी विदेशी लोगों को बसाना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन जापान अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक पहचान को लेकर काफी संवेदनशील है। ऐसे में यह रास्ता भी आसान नहीं माना जाता।
फिलहाल जापान दुनिया के सामने एक ऐसे देश की तस्वीर पेश कर रहा है, जहां तकनीकी प्रगति तो तेजी से हो रही है, लेकिन घटती आबादी भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
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