ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दुनिया इस समय एक और बड़े संघर्ष के खतरे के साये में है। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के साथ बढ़ते तनाव ने तेल बाजार को हिलाकर रख दिया है। ऐसे वक्त में भारत के लिए एक राहत भरी खबर आई है। अमेरिकी प्रशासन ने रूस के समुद्र में फंसे तेल टैंकरों को सीमित समय के लिए भारत आने की इजाजत दे दी है। यह छूट सिर्फ 30 दिनों के लिए है, लेकिन इसकी अहमियत काफी ज्यादा मानी जा रही है। .
भारत की तेल पर निर्भरता और बढ़ती चिंता
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। देश के पास कच्चे तेल का स्टॉक भी सीमित समय के लिए ही होता है। जानकारी के मुताबिक, अभी भारत के पास करीब 25 दिनों का कच्चा तेल स्टॉक है और लगभग 40 फीसदी सप्लाई उस रास्ते से आती है, जो ईरान के पास से होकर गुजरता है। अगर वहां युद्ध या बाधा की स्थिति बनती है, तो भारत पर सीधा असर पड़ सकता है। .
इसी चिंता के बीच यह अस्थायी छूट मिली है, ताकि रूसी तेल भारतीय रिफाइनरी तक पहुंच सके और अचानक किसी बड़े झटके से बचाव हो सके। .
रूस से तेल खरीद पर पहले क्यों लगी थी रोक?
रूस–यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने सस्ते दाम पर रूसी तेल खरीदकर काफी फायदा उठाया था। धीरे‑धीरे भारत रूस का बड़ा ग्राहक बन गया। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों की सख्त नज़र इस व्यापार पर बनी रही। .
जनवरी के बाद से भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने रूसी तेल की खरीद घटा दी, क्योंकि उस पर दबाव बढ़ रहा था और कुछ मामलों में ऊंचे टैरिफ और अन्य जोखिम की आशंका भी थी। अब अस्थायी छूट के साथ रूस के समुद्र में फंसे कार्गो को भारत भेजने का रास्ता फिर खुला है। .
कौन‑कौन सी कंपनियां होंगी एक्टिव?
बहुत सी सरकारी और निजी रिफाइनरी कंपनियां इस फैसले से राहत महसूस कर रही हैं। वे फिर से रूसी तेल की डील करने में सक्रिय हो गई हैं। बताया जा रहा है कि कई कंपनियां पहले ही करीब 2 करोड़ बैरल तेल की खरीद तय कर चुकी हैं या उस पर बातचीत कर रही हैं। .
कुछ कंपनियां नवंबर के बाद पहली बार रूसी तेल की डिलीवरी लेने की तैयारी में हैं। उन्होंने अब कीमत से ज्यादा ज़रूरी “उपलब्धता” को प्राथमिकता दी है, क्योंकि युद्ध के माहौल में कच्चे तेल की सप्लाई सुरक्षित रखना सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। .
दाम पहले सस्ते, अब महंगे क्यों?
एक समय था जब रूसी तेल ब्रेंट क्रूड की तुलना में काफी सस्ता मिल रहा था। फरवरी में यह अंतर लगभग 13 डॉलर प्रति बैरल तक था। लेकिन मौजूदा हालात में ट्रेडर्स इसे ब्रेंट से 4–5 डॉलर महंगा बेच रहे हैं। .
कारण साफ है – जब सप्लाई पर खतरा हो, तो जो भी तेल उपलब्ध होता है, उसकी कीमत ऊपर जाती है। अब भारतीय कंपनियां यह सोच रही हैं कि सिर्फ सस्ता तेल देखने से काम नहीं चलेगा, पहले यह देखना होगा कि जरूरत के समय तेल मिल भी पा रहा है या नहीं। .
30 दिन की छूट, आगे क्या?
यह राहत फिलहाल सिर्फ 30 दिनों के लिए है और वह भी उन कार्गो पर, जो पहले से फंसे हुए थे। आगे क्या होगा, यह अभी साफ नहीं है। अगर युद्ध और तनाव बढ़ता है, तो नए फैसले भी आ सकते हैं, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा को फिर से चुनौती दे सकते हैं। .
फिलहाल इतना जरूर है कि इस कदम से बाजार में तुरंत कुछ राहत पहुंचेगी, रिफाइनरी के पास काम चलाने के लिए अतिरिक्त कच्चा तेल होगा और अचानक किसी बड़े संकट से बचाव हो सकेगा। लेकिन लंबे समय के लिए भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता और घरेलू विकल्पों पर ज़्यादा जोर देना ही होगा, ताकि हर बार किसी संघर्ष या प्रतिबंध के सहारे न रहना पड़े।
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