ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दुनिया में एक ऐसा महाद्वीप है जो आज भी किसी एक देश का हिस्सा नहीं है, बल्कि 50 से ज्यादा देश इसके “साझा मालिक” हैं। ये अनोखी और बेहद खास जगह है अंटार्कटिका, धरती का सबसे दक्षिणी और बर्फ से ढका हुआ महाद्वीप।
यहां कोई सरकार नहीं, कोई सीमा नहीं और कोई झंडा नहीं फहरता, फिर भी पूरी दुनिया के वैज्ञानिक यहां काम कर रहे हैं।
हैरान करने वाली बात ये है कि इस महाद्वीप की सुरक्षा, संरचना और नियम एक संधि के जरिए तय होते हैं, जिसे दुनिया के 55 से ज्यादा देशों ने स्वीकार किया है।
न किसी का अधिकार, न सैन्य गतिविधि की इजाजत
अंटार्कटिका पर 1 दिसंबर 1959 को वाशिंगटन डीसी में एक ऐतिहासिक संधि पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे।
इस संधि का मकसद था कि इस विशाल और बर्फीले महाद्वीप को पूरी तरह वैज्ञानिक शोध और शांति के लिए सुरक्षित रखा जाए। आज ये संधि 55 से ज्यादा देशों तक पहुंच चुकी है।
संधि के अनुसार:
यहां कोई भी देश मालिकाना दावा नहीं कर सकता
सैन्य गतिविधियों की सख्त मनाही है
पूरा महाद्वीप वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए समर्पित है
साझे प्रयासों का केंद्र: रिसर्च स्टेशन
अंटार्कटिका में दुनिया के तमाम देशों के स्थायी और अस्थायी रिसर्च सेंटर मौजूद हैं। यहां पर सबसे बड़े रिसर्च बेस में अमेरिका का मैकमुरडो स्टेशन, भारत का दक्षिण गंगोत्री और भारती स्टेशन, बेल्जियम का प्रिंस एलिजाबेथ स्टेशन शामिल हैं।
यहां सालभर वैज्ञानिक मौसम, जलवायु, ग्लेशियर, समुद्री जीवन और खनिज संसाधनों पर शोध करते हैं।
इन रिसर्च स्टेशनों पर काम करने वाले वैज्ञानिक बेहद कठिन परिस्थितियों में भी मानवता और विज्ञान के लिए मिलकर काम करते हैं।
क्यों है अंटार्कटिका इतनी अहम?
अंटार्कटिका न सिर्फ एक रहस्यमयी भूभाग है, बल्कि ये पृथ्वी के मौसम और समुद्री जलवायु तंत्र के लिए एक संवेदनशील संकेतक की तरह भी काम करता है।
इस क्षेत्र में बर्फ की परतों के नीचे बेशकीमती खनिज और पुरातन जलवायु के सबूत छिपे हैं, जिन्हें समझना मानव भविष्य के लिए बेहद जरूरी माना जाता है।
आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।
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