ईरान पर सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए अमेरिकी संसद में प्रस्ताव पास, ट्रंप पर बढ़ा दबाव
अमेरिकी संसद ने ईरान से जुड़े सैन्य अभियान पर राष्ट्रपति की शक्तियां सीमित करने वाला प्रस्ताव पास किया है। इससे डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक और कानूनी दबाव बढ़ गया है।
ईरान पर सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए अमेरिकी संसद में प्रस्ताव पास, ट्रंप पर बढ़ा दबाव
  • Category: विदेश

अमेरिका में ईरान को लेकर चल रही सियासी और सैन्य बहस अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने एक ऐसा प्रस्ताव पास किया है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान युद्ध से जुड़ी शक्तियों को सीमित करने की कोशिश करता है। इस प्रस्ताव के पक्ष में 215 वोट पड़े, जबकि 208 सांसद इसके खिलाफ रहे। खास बात यह रही कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसदों ने भी पार्टी लाइन से हटकर इसका समर्थन किया।


प्रस्ताव इतना अहम क्यों है

यह सिर्फ एक सामान्य संसदीय प्रक्रिया नहीं है। असल में यह अमेरिकी संविधान और युद्ध संबंधी अधिकारों को लेकर पुरानी बहस का हिस्सा है। कई सांसदों का कहना है कि अगर किसी विदेशी सैन्य अभियान को लंबे समय तक चलाना है, तो उसके लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होनी चाहिए। इस मुद्दे पर वॉर पावर्स एक्ट का भी जिक्र किया गया, जिसके अनुसार 60 दिन से अधिक की सैन्य कार्रवाई के लिए संसद की भूमिका अहम मानी जाती है।


रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। उनका कहना था कि जनता लंबे युद्ध, बढ़ती महंगाई और आर्थिक दबाव से परेशान है। यानी यह मामला सिर्फ विदेश नीति का नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति और रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गया है।


ट्रंप प्रशासन पर सवाल क्यों उठ रहे हैं

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका का ईरान अभियान 28 फरवरी से चल रहा है और अब 60 दिन की सीमा पार कर चुका है। आरोप यह है कि ट्रंप प्रशासन ने इस सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस से जरूरी मंजूरी नहीं ली। इसी वजह से अब इस पूरे अभियान की जांच भी शुरू हो गई है। पेंटागन, विदेश मंत्रालय और USAID के इंस्पेक्टर जनरल इस मामले को देख रहे हैं।


दूसरी तरफ, हाउस स्पीकर माइक जॉनसन जैसे नेता इस प्रस्ताव के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि इससे ट्रंप प्रशासन की शांति वार्ता और कूटनीतिक कोशिशें कमजोर हो सकती हैं। यह दिखाता है कि अमेरिका के भीतर भी इस मुद्दे पर साफ एक राय नहीं है।


जनता की थकान भी बड़ा कारण

इस बहस में सिर्फ कानून की भाषा नहीं, बल्कि जनता की नाराजगी भी झलक रही है। कुछ सांसदों ने कहा कि उनके क्षेत्र के लोग महंगे पेट्रोल, डीजल और खाद की कीमतों से परेशान हैं। लंबे युद्ध का असर आखिरकार लोगों की जेब पर पड़ता है। यही वजह है कि युद्ध पर संसद की मंजूरी का सवाल अब और जोर से उठ रहा है।


कई बार विदेश नीति के फैसले दूर की चीज लगते हैं, लेकिन सच यह है कि उनका असर आम लोगों के जीवन पर भी आता है। जब युद्ध लंबा चलता है, तो उसके आर्थिक और राजनीतिक दोनों परिणाम देश के भीतर महसूस होते हैं।


आगे क्या होगा

यह प्रस्ताव अब सीनेट के पास जाएगा। हालांकि रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि यह सीधे कानून नहीं बनेगा और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भी नहीं जाएगा, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व कम नहीं है। इससे ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ेगा और ईरान नीति को लेकर बहस और तेज हो सकती है।


इस घटनाक्रम ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि अमेरिका में युद्ध छेड़ना सिर्फ राष्ट्रपति का फैसला नहीं माना जा सकता। जब संसद, जांच एजेंसियां और खुद सत्ताधारी दल के कुछ नेता सवाल पूछने लगें, तो मामला साधारण नहीं रह जाता।


बदलती राजनीति का संकेत

यह प्रस्ताव यह भी दिखाता है कि ट्रंप को हर मुद्दे पर अपनी पार्टी का पूरा समर्थन नहीं मिल रहा। विदेश नीति जैसे बड़े मामलों में भी अब अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।


फिलहाल इतना तय है कि ईरान को लेकर ट्रंप प्रशासन की राह आसान नहीं दिख रही। युद्ध, कानून, अर्थव्यवस्था और राजनीति—इन चारों के बीच अब यह मामला और उलझता दिखाई दे रहा है।

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