ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
दक्षिण एशिया के नक्शे पर स्थित बांग्लादेश कभी धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक माना जाता था। 1971 में स्वतंत्रता मिलने के समय हिंदू समुदाय देश की कुल आबादी का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा था। इस समुदाय ने समाज, व्यापार, शिक्षा और संस्कृति में अहम योगदान दिया। लेकिन पिछले पांच दशक में इस हिस्सेदारी में लगातार गिरावट आई है, जो आज एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न बन चुकी है।
1971 से पहले और बाद की स्थिति
1901 में पूर्वी बंगाल में हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 33 प्रतिशत थी। स्वतंत्रता के समय यह घटकर 22 प्रतिशत रह गई थी। 1971 का स्वतंत्रता संग्राम बांग्लादेश के इतिहास का बड़ा मोड़ साबित हुआ। इस दौरान हिंसा, असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य के डर से लाखों हिंदू भारत और अन्य देशों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। स्वतंत्रता के तुरंत बाद भी समाज में पूर्ण स्थिरता नहीं लौट पाई।
दशकों में गिरती आबादी
जनगणना के आंकड़े इस गिरावट की कहानी बयां करते हैं। 1974 में हिंदू आबादी घटकर 13.5 प्रतिशत रह गई। 1991 तक यह संख्या 10.5 प्रतिशत तक पहुंच गई और 2011 में यह 8.5 प्रतिशत रह गई। सबसे ताजा 2022 की जनगणना में हिंदुओं की संख्या केवल 7.95 प्रतिशत रही। आंकड़ों के अनुसार यह करीब 1.3 करोड़ लोगों के आसपास बैठती है। प्रतिशत में यह गिरावट लगातार जारी है।
2024 की हिंसा और सामाजिक अस्थिरता
जुलाई‑अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए हिंसक आंदोलन ने हालात और बिगाड़ दिए। आरक्षण से जुड़े हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ युवा आंदोलन देखते ही देखते हिंसा में बदल गया। इसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी। इस दौरान अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरें आईं, जिससे सुरक्षा की चिंता और बढ़ गई।
हिंदू आबादी के प्रमुख क्षेत्र
आज भी बांग्लादेश के कुछ इलाकों में हिंदू समुदाय की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। गोपालगंज, सिलहट और ठाकुरगांव में उनकी हिस्सेदारी अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहतर है। लेकिन देश के बाकी हिस्सों में उनकी संख्या लगातार घटती जा रही है, खासकर ग्रामीण इलाकों में।
गिरावट के पीछे कारण
हिंदू आबादी में गिरावट के पीछे कई कारण हैं। बार‑बार होने वाली हिंसा, सामाजिक भेदभाव, सुरक्षा की कमी और बेहतर भविष्य की तलाश ने परिवारों को पलायन करने के लिए मजबूर किया। हाल के वर्षों में बढ़ी हिंसा ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है।
आज की सच्चाई
लगभग 17 करोड़ की आबादी वाले मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में हिंदू आज भी दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय हैं। हालांकि उनकी हिस्सेदारी लगातार कम होती जा रही है। यह गिरावट दशकों से चले आ रहे हालात और राजनीतिक‑सामाजिक अस्थिरता का परिणाम है। यदि सरकार और समाज की ओर से ठोस कदम न उठाए गए, तो यह प्रवृत्ति और बढ़ सकती है।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!