ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
लोकसभा में सोमवार, 8 दिसंबर 2025 को वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा का माहौल था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के माध्यम से बहस की शुरुआत की। इसके जवाब में कांग्रेस की ओर से डिप्टी लीडर गौरव गोगोई और प्रियंका गांधी ने अपने विचार व्यक्त किए। इसी बहस के दौरान शिवसेना यूबीटी के सांसद अरविंद सावंत ने वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी से जुड़ी 1873 की एक महत्वपूर्ण घटना का ज़िक्र किया, जिसने उन्हें राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर मजबूर किया।
सांसद अरविंद सावंत ने बताया कि यह किस्सा बंकिम चंद्र के स्वाभिमान और आत्मसम्मान का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सच्ची राष्ट्रभक्ति वही है, जो अपने अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ाई लड़ने में प्रकट होती है।
मुर्शिदाबाद में डिप्टी मजिस्ट्रेट थे बंकिम चंद्र
1873 में बंकिम चंद्र चटर्जी मुर्शिदाबाद जिले के बहरामपुर में डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात थे। उस समय भारतीय और अंग्रेजों के बीच स्पष्ट भेदभाव था। अंग्रेज अधिकारी भारतीयों को अपनी उपेक्षा और अपमान का शिकार बनाते थे। बहरामपुर का छावनी इलाका अंग्रेजों का मुख्य केंद्र था, जहां उनके नियम-कायदे चलते थे।
कर्नल डफिन ने बंकिम चंद्र को अपमानित किया
एक दिन बंकिम चंद्र अपनी पालकी में लौट रहे थे। इसी दौरान लालदीघी मैदान में अंग्रेज सैनिक क्रिकेट खेल रहे थे, जिसमें लेफ्टिनेंट कर्नल डफिन भी शामिल थे। नियम था कि जब कोई अंग्रेज अधिकारी सामने हो, भारतीय अधिकारी अपनी सवारी से उतरकर सम्मान प्रकट करें। बंकिम चंद्र ने ऐसा नहीं किया। इससे क्रोधित कर्नल डफिन ने पालकी रुकवा दी, बंकिम को अपमानित किया और उन्हें धक्का भी दिया।
इस अपमान ने बंकिम के अंदर गहरी बैचेनी पैदा की। उन्होंने ठान लिया कि इस अन्याय को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बंकिम चंद्र ने दर्ज कराया आपराधिक मामला
बंकिम चंद्र ने अगले ही दिन कर्नल डफिन के खिलाफ अदालत में आपराधिक मामला दर्ज कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि डफिन ने उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया और हमला करने की कोशिश की। इस खबर ने पूरे जिले में तहलका मचा दिया।
मामला डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मिस्टर विंटर के पास गया। विंटर ने बंकिम पर दबाव डाला कि केस वापस लें, लेकिन बंकिम ने साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि सवाल यह नहीं कि वे कौन हैं, बल्कि किसी भारतीय को अपमानित करने का अधिकार किसी अंग्रेज अधिकारी को कैसे हो सकता है।
अदालत में मिली न्यायिक जीत
12 जनवरी 1874 को बहरामपुर की अदालत में मामला सुनवाई के लिए पेश किया गया। हजारों लोग बाहर इकट्ठा हुए। अदालत ने गवाहों की गवाही के आधार पर कर्नल डफिन को दोषी ठहराया। जज ने डफिन को सलाह दी कि वे सार्वजनिक रूप से माफी मांगें। दबाव में आकर कर्नल डफिन ने सैकड़ों भारतीयों के सामने औपचारिक रूप से माफी मांगी।
स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक
यह घटना बंकिम चंद्र चटर्जी के स्वाभिमान और साहस का परिचायक है। उन्होंने दिखाया कि अपने अधिकारों और सम्मान के लिए खड़ा होना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है। इसी घटना ने उन्हें वंदे मातरम् जैसी महान रचना की प्रेरणा दी। आज भी यह कहानी हमें आत्मसम्मान और न्याय के लिए लड़ने की सीख देती है।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!