ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
भारत में जब भी पुलिस एनकाउंटर की चर्चा होती है, तो इसके पक्ष और विपक्ष में बहस शुरू हो जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि देश का पहला चर्चित पुलिस एनकाउंटर कब हुआ था और उसका निशाना कौन बना था। यह कहानी है मुंबई के उस दौर की, जब अंडरवर्ल्ड का खौफ चरम पर था और पुलिस अपराधियों के सामने बेबस नजर आने लगी थी।
जब अपराधियों के साये में जी रही थी मुंबई
1980 के दशक की शुरुआत में मुंबई, जिसे तब बॉम्बे कहा जाता था, देश की आर्थिक राजधानी होने के साथ-साथ अपराध जगत का भी बड़ा केंद्र बन चुकी थी। शहर में रंगदारी, सुपारी किलिंग, अपहरण और गैंगवार आम बात थी। उस दौर में करीम लाला, बड़ा राजन और दाऊद इब्राहिम जैसे नाम अंडरवर्ल्ड की दुनिया पर राज कर रहे थे। अलग-अलग गैंगों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में आम लोगों की जिंदगी प्रभावित हो रही थी। पुलिस पर लगातार दबाव बढ़ रहा था कि वह अपराधियों के बढ़ते आतंक पर लगाम लगाए।
होनहार छात्र से गैंगस्टर बनने तक का सफर
इसी दौर में एक नाम तेजी से उभरा—मान्या सुर्वे। उसका असली नाम मनोहर अर्जुन सुर्वे था। कहा जाता है कि वह पढ़ाई में काफी अच्छा था और एक सामान्य जिंदगी जी सकता था। लेकिन हालात और संगत ने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी। उसका बड़ा भाई पहले से अपराध की दुनिया से जुड़ा हुआ था। वर्ष 1969 में एक हत्या के मामले में मान्या और उसके भाई को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। मान्या को पुणे की यरवदा जेल भेजा गया। जेल में भी उसका आक्रामक रवैया जारी रहा। विरोधी कैदियों से झगड़ों के कारण उसे दूसरी जेल में स्थानांतरित किया गया। बाद में बीमारी का बहाना बनाकर अस्पताल में भर्ती हुआ और वहीं से फरार हो गया।
जेल से भागकर बना अंडरवर्ल्ड का बड़ा नाम
जेल से भागने के बाद मान्या सुर्वे फिर मुंबई लौट आया। उसने अपना गैंग तैयार किया और देखते ही देखते अपराध जगत में बड़ा नाम बन गया। उसके खिलाफ रंगदारी, हत्या और गैंगवार जैसे कई गंभीर आरोप लगने लगे। उसकी बढ़ती ताकत और बेखौफ अंदाज ने मुंबई पुलिस के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। माना जाता है कि उस समय वह कई बड़े अपराधों में शामिल था और पुलिस लंबे समय से उसकी तलाश कर रही थी।
बनी देश की पहली एनकाउंटर स्क्वाड
मान्या सुर्वे को पकड़ना आसान नहीं था। ऐसे में मुंबई पुलिस ने विशेष रणनीति तैयार की। अपराधियों से निपटने के लिए एक विशेष टीम बनाई गई, जिसे बाद में एनकाउंटर स्क्वाड के रूप में पहचान मिली। इस मिशन की जिम्मेदारी पुलिस अधिकारियों राजा तांबट और इशाक बागवान जैसे अनुभवी अफसरों को सौंपी गई। टीम लगातार मान्या की गतिविधियों पर नजर रख रही थी।
11 जनवरी 1982: जब खत्म हुआ आतंक
आखिरकार 11 जनवरी 1982 को पुलिस को गुप्त सूचना मिली कि मान्या सुर्वे मुंबई के वडाला इलाके में स्थित आंबेडकर कॉलेज के पास आने वाला है। सूचना मिलते ही पुलिस ने इलाके में जाल बिछा दिया। दोपहर के समय जैसे ही मान्या टैक्सी से उतरा, पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। पुलिस के अनुसार, कार्रवाई के दौरान उस पर गोलियां चलाई गईं और वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे अस्पताल ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। इसी घटना को भारत का पहला चर्चित पुलिस एनकाउंटर माना जाता है।
क्यों याद किया जाता है यह एनकाउंटर?
मान्या सुर्वे का एनकाउंटर सिर्फ एक अपराधी के अंत की कहानी नहीं था, बल्कि यह भारतीय पुलिसिंग के इतिहास में एक नए दौर की शुरुआत भी माना जाता है। इसके बाद मुंबई पुलिस की एनकाउंटर नीति चर्चा का विषय बनी और आगे चलकर कई बड़े गैंगस्टरों के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाइयां देखने को मिलीं। आज भी मान्या सुर्वे का नाम भारत के अपराध इतिहास और पुलिस कार्रवाई की सबसे चर्चित कहानियों में शामिल किया जाता है।
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