ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
हाथ में बम, सीने में जज्बा, उस लड़ाके की बहादुरी जिसने दुश्मन के 4 ठिकाने तबाह कर दिए…
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं 26 जुलाई की, जब कारगिल विजय के नाम का दिन पूरा देश गर्व से मनाता है।
दरअसल, 1999 में हुई उस दुगनी, तिगुनी लड़ाई को याद करते हुए एक नाम है जो हर जुबान पर आता है, कैप्टन मनोज कुमार पांडेय। नाम ही काफी है और सुनते ही बस सीना चौड़ा हो जाता है, और आंखें नम हो जाती हैं।
सिपाही से हीरो तक का सफर
25 जून 1975 को यूपी के सीतापुर जिले के रूद्रा गांव में जन्मे मनोज पांडेय बचपने से ही सेना में जाने के सपने संजोये रहे।
लखनऊ के सैनी स्कूल में पढ़ते रहे, फिर NDA से होकर IMA देहरादून में पहुंचकर 11 गोरखा राइफल्स में कप्तान बन गए।
फिजिक्स से बॉडी तक, फिटनेस का धाकड़ मिसाल
बॉडी बिल्डिंग और मुक्केबाजी करते थे। पूरी टाइम बटालियन में फिटनेस और घूम-घूम के अंदाज से सबसे फेमस। ये फिजिकल फिटनेस ही उन्हें मिली शहादत में चमक।
दुश्मन का गढ़ घेरे दिलेर कप्तान
1999 में कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा कर लिया था।
काम था साफ, उन बंकरों को ध्वस्त करना और देश का तिरंगा एक बार फिर गाड़ना। हमारे बटालियन को ये जिम्मा सौंपा गया।
कैप्टन पांडेय अकेले नहीं, लेकिन अकेले जैसे लड़े। रात की अँधेरी में 19700 फीट की ऊंचाई पर पहलवान चौकी की ओर बढ़ते हुए उन्होंने देखी गोलाबारी और दुश्मनों के बंकरों की कमान। उनके सामने गढ़े हुए दुश्मन के चार बंकर, जिनके अंदर जैसे जान मौजूद थी।
पहली गोली, पहली पारी, पहला बंकर
भारी-मोटी राइफल के साथ वे दुश्मन के दो बंकरों को एक झटके में क्लीन कर गए। क्या गजब था उनका इरादा, क्या अद्भुत था उनका हौसला!
घुट से लड़ाई, खून की बारिश, जज्बे की आवाज
तीसरे बंकर पर जब हमला कर रहे थे, तो गोलियां चलना शुरू हो गईं, कंधा-बाॅयर-दोनों पैर पर लगीं। चोटें ऐसी कि खून भरा। लेकिन दिल हारने वालों में से थे क्या? सर उठा कर बोले, “आगे बढ़ना है”, और आखिरी बंकर पर दुश्मन को घुटने गाड़ दिए।
आखिरी शौर्य, सिर से चार गोलियां और शहादत
जब चौथे बंकर पर फतह पक्की हो गयी थी, तभी सिर से चार गोलियां आर-पार हो गईं। जिस शख्स ने पहाड़ की चोट खाई, जख्म गले में समा गये, उसने दुश्मन के गढ़ को धराशायी करके शहीद होकर इतिहास लिखा। उम्र अभी थी सिर्फ 24 बरस!
वीरता को मिला सर्वोच्च सम्मान
उनकी मौत के बाद देश ने उनको परमवीर चक्र से नवाज़ा। वहीं यूपी सैनिक स्कूल लखनऊ का नाम बदलकर कैप्टन मनोज कुमार पांडेय यूपी सैनिक स्कूल कर दिया। खुद उनका नाम ऐतिहासिक बन गया।
बहुत पहले दिखाया था जज्बा
रचना बिष्ट की किताब "द ब्रेव" में बताया गया कि जब लेफ्टिनेंट मनोज NDA में थे तब दशहरे पर मुहिम शुरू हुई, सेना में अपनी वीरता साबित करो। कामरा बाँधने को दिया गया बकरे का सिर काटने को कहा गया।
मनोज जी को मजबूरी महसूस हुई लेकिन उन्होंने अंजाम दिया। हार्दिक रिश्ता हो गया उस संगीत से, जहां उन्होंने पहचाना था, “मैं जानता हूं कि जान देता हूं, अगर देश कहे।”
फिनिश लाइन, देशमाता की गोद में शहीद
1960 में जन्मा रुद्रा गांव का वह लड़का, जिसके नाम ने गुजरात की वीर मंगेंदर सिंह जैसे अनेकों जवानों को जलवा दिया। आज वो हमारे दिलों में तन-मन की तरह मौजूद हैं।
26 जुलाई को जब आप कारगिल विजय दिवस मनाएं, तो एक बार जरूर सोचिएगा, जिस शौर्य ने बंकर ढहाये, जिसने सिर से चार गोलियां लील लीं, जिसने 24 साल में धरती पर एक अमिट स्मृति बनायी, उसकी शहादत को दिल से नमन करे।
देशमाता गर्व करेगी ऐसे सपूतों पर, जिन्होंने खुद को मिटा दिया लेकिन अपनी गाथा अमर कर गयी।
आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।
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