AAP के समय LG-केंद्र पर हुए केस वापस लेने की तैयारी, दिल्ली सरकार ने बताया वजह क्या है
दिल्ली में नई सरकार AAP कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक अफसरों, उपराज्यपाल और केंद्र सरकार के खिलाफ दर्ज/दायर मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया तेज कर रही है। बताया जा रहा है कि इसका मकसद कामकाज में स्थिरता और बेहतर तालमेल है।
AAP के समय LG-केंद्र पर हुए केस वापस लेने की तैयारी, दिल्ली सरकार ने बताया वजह क्या है
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दिल्ली में सत्ता बदलने के बाद अब एक बड़ा प्रशासनिक कदम चर्चा में है—नई सरकार AAP के कार्यकाल में प्रशासनिक अधिकारियों, उपराज्यपाल (LG) और केंद्र सरकार के खिलाफ दर्ज/दायर मामलों को वापस लेने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

सरकार की तरफ से यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों को खत्म कराने के लिए अदालत में जल्द सुनवाई की प्रक्रिया शुरू कराने पर जोर दिया जा रहा है।

यह फैसला कागज पर “कानूनी मामला” दिखता है, लेकिन इसके असर सीधे रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ सकते हैं। अगर सरकार और LG/केंद्र के बीच टकराव कम होता है, तो कई फाइलें जो अटकती हैं, वे जल्दी आगे बढ़ सकती हैं—ऐसी उम्मीद लोग करते हैं। दूसरी तरफ, विपक्ष इसे राजनीतिक कदम मान सकता है और सवाल उठा सकता है कि पुराने फैसलों की जवाबदेही कैसे तय होगी।


सरकार की वजह क्या बताई जा रही है

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, इस कदम के पीछे मुख्य सोच “प्रशासनिक स्थिरता” लाना और केंद्र सरकार के साथ रिश्ते बेहतर करना है।
अधिकारियों ने 9 फरवरी को इस फैसले की पुष्टि किए जाने की बात भी कही है।

सरकार का तर्क सीधा है—झगड़े और मुकदमे बढ़ेंगे तो समय, पैसा और ऊर्जा वहीं लगेगी, जबकि लोगों के काम उतनी तेजी से नहीं हो पाएंगे। इसलिए नई टीम यह संदेश देना चाहती है कि वह टकराव कम करके कामकाज की रफ्तार बढ़ाएगी। हालांकि, किसी भी केस को वापस लेने से पहले नियम-कानून और अदालत की प्रक्रिया पूरी करनी होती है, इसलिए यह तुरंत “एक दिन में” खत्म होने वाला मामला नहीं है।


किन-किन मुद्दों पर केस बने थे

बताया गया है कि पिछली सरकार के काम, नीतियों और फैसलों की समीक्षा में सामने आया कि प्रशासनिक अधिकारियों, केंद्र सरकार और LG के खिलाफ कई केस दर्ज/दायर किए गए थे।
इन मामलों में दिल्ली विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति से जुड़ा विवाद भी शामिल बताया गया है।
सेवा से जुड़े मामलों
कंट्रोल को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच टकराव वाला मुद्दा भी इन केसों में शामिल रहा है। आयुष्मान भारत हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर मिशन के लागू करने पर मतभेद का जिक्र भी किया गया है।

दिल्ली जल बोर्ड के लिए फंडिंग और बजट अधिकारों को लेकर विवाद भी सूची में बताया गया है। दिल्ली दंगों के मामलों में वकीलों की नियुक्ति से जुड़ा प्रश्न भी इनमें शामिल बताया गया है। यमुना प्रदूषण से निपटने के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाने पर असहमति का मुद्दा भी इन मामलों में बताया गया है।

इन सब मुद्दों का मतलब आम भाषा में यह है कि सरकार और LG/केंद्र के बीच कई फैसलों पर “कौन तय करेगा” और “कैसे होगा” जैसी बातों पर खींचतान चलती रही। जब ऐसे विवाद कोर्ट तक पहुंच जाते हैं, तो फाइलें लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में फंस सकती हैं। आम लोगों को इसका असर बिजली-पानी, स्वास्थ्य सेवाओं, नियुक्तियों और अलग-अलग विभागों के रोजमर्रा के फैसलों में देरी के रूप में दिखता है।


केस वापस लेने की प्रक्रिया कैसे चलती है

अधिकारियों के अनुसार, विधि विभाग ने सत्ता में आने के बाद इन मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
इसके तहत संबंधित अदालतों में आवेदन देकर जल्द सुनवाई और मामलों की समाप्ति का अनुरोध किया गया है।

सामान्य तौर पर किसी भी सरकार के लिए अदालत में चल रहे केस वापस लेना सिर्फ “घोषणा” नहीं होता। इसके लिए कानून विभाग को फाइलें देखनी पड़ती हैं, केस की स्थिति समझनी पड़ती है, फिर कोर्ट में औपचारिक आवेदन देना पड़ता है। कई मामलों में अदालत यह भी देखती है कि केस वापस लेने से किसी पक्ष के अधिकार पर गलत असर तो नहीं पड़ रहा। इसलिए आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि कौन-कौन से केस तेजी से बंद होते हैं और किन पर लंबी सुनवाई चल सकती है।


सरकार कह रही है—ऊर्जा और संसाधन बचेंगे

सरकार का मानना है कि इन मुकदमों को चलाते रहने से प्रशासनिक ऊर्जा और संसाधनों की बेवजह खपत हो रही थी।
सरकार यह भी कह रही है कि अब वह केंद्र और LG के साथ समन्वय बढ़ाकर शासन को ज्यादा सुचारू बनाने पर जोर दे रही है।

यह बात सुनने में व्यावहारिक लगती है, क्योंकि प्रशासन में कई बार “किसका आदेश चलेगा” की खींचतान के कारण अफसर भी निर्णय लेने में झिझकते हैं। जब ऊपर से संदेश आता है कि टकराव नहीं, तालमेल चाहिए, तो काम की दिशा ज्यादा स्पष्ट होती है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता है कि जिन विवादों को पहले “महत्वपूर्ण मुद्दा” मानकर कोर्ट में ले जाया गया, क्या वे अब वाकई जरूरी नहीं रहे—या राजनीति बदलते ही प्राथमिकताएं बदल गईं?

राजनीतिक संदेश और आगे की तस्वीर

इस कदम को कुछ लोग दिल्ली में “नई कार्यशैली” और सहयोग वाली राजनीति की शुरुआत के तौर पर भी देखते हैं।
अब सबकी नजर इस पर रहेगी कि यह बदलाव सिर्फ कागजों में दिखता है या जमीन पर भी—जैसे फैसलों की रफ्तार, विभागों की जवाबदेही और जनता से जुड़े कामों की टाइमलाइन में सुधार।

आगे सबसे अहम बात यह होगी कि सरकार किन मामलों को पहले निपटाने की कोशिश करती है और किन पर कानूनी राय लेकर समय लेती है। साथ ही, कोर्ट में सुनवाई की गति भी बड़ा फैक्टर है—क्योंकि आवेदन देने के बाद भी अंतिम फैसला अदालत की प्रक्रिया से ही होगा। अगर यह प्रक्रिया सही तरीके से और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ती है, तो दिल्ली के प्रशासन में लंबे समय से चल रहा “टकराव वाला माहौल” कुछ हद तक कम हो सकता है।

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