ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा कम होता है कि सपा, बसपा और कांग्रेस किसी एक मुद्दे पर एक जैसी आवाज में दिखाई दें. लेकिन कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग ने ऐसा दृश्य बना दिया, जहां अखिलेश यादव, मायावती और राहुल गांधी एक ही मांग के साथ खड़े नजर आए. यह केवल सम्मान का सवाल नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक और सामाजिक अहमियत भी जुड़ी हुई दिख रही है.
अखिलेश यादव ने क्या कहा
अखिलेश यादव ने कहा कि कांशीराम और समाजवादी धारा ने मिलकर देश को नई दिशा दी थी. उन्होंने याद दिलाया कि एक समय नेताजी और कांशीराम ने साथ मिलकर बीजेपी का मुकाबला किया था और उसे हराया था. अखिलेश ने यह भी कहा कि जो लोग कांशीराम के रास्ते पर चलते रहे और जीवनभर संघर्ष करते रहे, वे चाहते हैं कि उन्हें भारत रत्न मिले, और उनकी पार्टी भी इस मांग के साथ खड़ी है.
यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि सपा और बसपा के रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे. ऐसे में अखिलेश का कांशीराम के नाम पर समर्थन देना एक राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है.
मायावती का रुख क्यों अहम है
मायावती ने कांशीराम जयंती पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि जैसा व्यवहार कांग्रेस ने लंबे समय तक बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के साथ किया, वैसी गलती अब भाजपा या एनडीए सरकार को नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि समतामूलक समाज बनाने में कांशीराम का योगदान अतुलनीय है और उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए.
मायावती का यह बयान भावनात्मक भी है और राजनीतिक भी. क्योंकि कांशीराम सिर्फ बसपा के संस्थापक नहीं, बल्कि बहुजन राजनीति की सबसे बड़ी धुरी माने जाते हैं. उनके नाम पर कोई भी मांग सीधे दलित समाज की भावनाओं से जुड़ जाती है.
राहुल गांधी ने कैसे बढ़ाया दबाव
राहुल गांधी ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की. उन्होंने अपने पत्र में कांशीराम को दलितों, पिछड़ों और बहुजन राजनीति को नई दिशा देने वाला जनक बताया. राहुल ने सोशल मीडिया पर भी यह बात रखी और कहा कि सामाजिक न्याय के इस बड़े योद्धा को सम्मान मिलना चाहिए.
कांग्रेस की तरफ से इस मांग का समर्थन इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि यूपी में दलित वोटबैंक को लेकर मुकाबला लगातार तेज होता जा रहा है. ऐसे में यह मांग राजनीतिक संदेश का काम भी कर रही है.
सम्मान की मांग या चुनावी रणनीति
राजनीतिक जानकार इस पूरे मामले को सिर्फ सम्मान की बहस नहीं मान रहे. रिपोर्ट में भी साफ संकेत है कि सपा और कांग्रेस की नजर बहुजन समाज पार्टी के दलित वोटबैंक पर है, क्योंकि यूपी में दलित वोटबैंक चुनावी नतीजों पर बड़ा असर डालता है. यही वजह है कि कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग को आने वाले विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है.
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि कांशीराम का योगदान भारतीय राजनीति में बड़ा रहा है. उन्होंने बहुजन चेतना को एक दिशा दी, संगठन खड़ा किया और उन वर्गों को आवाज दी जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा की राजनीति में पर्याप्त जगह नहीं मिली.
जनता इसे कैसे देख रही है
आम लोगों के बीच यह सवाल जरूर है कि क्या यह मांग ईमानदार सम्मान के तौर पर उठ रही है या फिर चुनाव से पहले नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश है. लेकिन चाहे वजह जो भी हो, इतना साफ है कि कांशीराम का नाम आज भी राजनीति में असर रखता है.
यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी बात है. अलग-अलग रास्तों पर चलने वाले तीन बड़े चेहरे एक ऐसे नेता के नाम पर साथ दिखे, जिसने बहुजन राजनीति का चेहरा बदला. आने वाले समय में यह मांग और तेज होगी या नहीं, यह अलग बात है, लेकिन फिलहाल इसने यूपी की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है.
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!