ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश का सबसे विकसित और आधुनिक शहर माने जाने वाले नोएडा के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। पिछले करीब 50 वर्षों से किसानों से जमीन अधिग्रहित कर उसका आवंटन करने के मॉडल पर चल रहे नोएडा प्राधिकरण का लैंड बैंक अब लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गया है। ऐसे में सरकार भविष्य की वित्तीय व्यवस्था को लेकर गंभीर हो गई है।
इसी को देखते हुए उत्तर प्रदेश शासन के अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त (IIDC) एवं अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने नोएडा प्राधिकरण से एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट में यह बताने को कहा गया है कि जब जमीन से आय का स्रोत खत्म हो जाएगा, तब शहर के विकास और रखरखाव के लिए हर साल होने वाले 8 से 10 हजार करोड़ रुपये के खर्च की व्यवस्था कैसे होगी।
शासन के पत्र के बाद हरकत में आया प्राधिकरण
शासन का पत्र मिलते ही नोएडा प्राधिकरण का वित्त विभाग सक्रिय हो गया है। अधिकारियों के अनुसार, सरकार केवल मौजूदा समस्या का समाधान नहीं चाहती, बल्कि अगले 20 से 30 वर्षों के लिए ऐसा स्थायी वित्तीय मॉडल तैयार करना चाहती है, जिससे शहर का विकास बिना किसी आर्थिक संकट के जारी रह सके। फिलहाल नोएडा प्राधिकरण की सबसे बड़ी आय जमीन के आवंटन से होती रही है, लेकिन अब खाली जमीनें तेजी से कम होती जा रही हैं। ऐसे में नए राजस्व स्रोत तलाशना जरूरी हो गया है।
क्या नोएडा में लागू होगा हाउस टैक्स?
इस पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा हाउस टैक्स को लेकर हो रही है। नोएडा देश के उन बड़े शहरों में शामिल है, जहां अब तक नगर निगम का गठन नहीं हुआ है। इसी वजह से यहां संपत्ति कर (हाउस टैक्स) लागू नहीं है। अगर भविष्य में नगर निगम का गठन होता है या स्थानीय निकाय की व्यवस्था लागू की जाती है, तो हाउस टैक्स के जरिए हर साल स्थायी राजस्व प्राप्त किया जा सकता है। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला सरकार की समीक्षा के बाद ही लिया जाएगा।
इन विकल्पों पर भी हो रहा है मंथन
प्राधिकरण केवल हाउस टैक्स तक सीमित नहीं रहना चाहता। रिपोर्ट में कई अन्य आय के स्रोतों पर भी विचार किया जा रहा है। इनमें शहर की प्रमुख सड़कों, फ्लाईओवर और अंडरपास पर डिजिटल विज्ञापनों से आय बढ़ाना, मेट्रो स्टेशनों के आसपास ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) परियोजनाओं को बढ़ावा देना, पानी, सीवर, पार्किंग और कूड़ा निस्तारण जैसी सेवाओं के लिए यूजर चार्ज का पुनर्निर्धारण करना शामिल है।
इसके अलावा कम्युनिटी सेंटर, कन्वेंशन सेंटर और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जैसी परिसंपत्तियों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर संचालित करने और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए म्युनिसिपल बॉन्ड या ग्रीन बॉन्ड जारी करने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।
दूसरे शहरों के लिए भी बन सकता है मॉडल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नोएडा के लिए एक मजबूत और दीर्घकालिक वित्तीय मॉडल तैयार होता है, तो भविष्य में इसे उत्तर प्रदेश के अन्य विकास प्राधिकरणों में भी लागू किया जा सकता है। प्राधिकरण एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपेगा। इसके बाद सरकार इस पर विचार कर आगे की रणनीति तय करेगी। आने वाले दिनों में लिए जाने वाले फैसले न केवल नोएडा बल्कि पूरे प्रदेश के शहरी विकास मॉडल को प्रभावित कर सकते हैं।
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