GRAP-IV के बाद नोएडा में स्कूलों का बदला सिस्टम, छोटे बच्चों की क्लास पर सबसे ज्यादा असर
GRAP-IV लागू होने के बाद नोएडा के स्कूलों में कहीं ऑनलाइन, कहीं हाइब्रिड और कुछ जगह छोटे बच्चों के लिए स्कूल बंद जैसे कदम दिखे; माता-पिता भी सेहत को देखते हुए फैसले ले रहे हैं।
GRAP-IV के बाद नोएडा में स्कूलों का बदला सिस्टम, छोटे बच्चों की क्लास पर सबसे ज्यादा असर
  • Category: नोएडा-ग्रेनो

नोएडा में सोमवार को स्कूलों का माहौल एक जैसा नहीं दिखा—कहीं क्लासरूम खाली थे तो कहीं बच्चे सामान्य दिनों की तरह स्कूल पहुंच गए। इसकी वजह यह है कि दिल्ली-NCR में GRAP-IV लागू होने के बाद स्कूलों के लिए ऑनलाइन या हाइब्रिड क्लास चलाने के निर्देश दिए गए, लेकिन हर स्कूल की सुविधा और हर परिवार की स्थिति एक जैसी नहीं है। यही कारण है कि किसी स्कूल ने पूरी तरह ऑनलाइन मोड अपना लिया, किसी ने हाइब्रिड रखा, और कुछ स्कूलों को छोटे बच्चों की क्लास बंद करनी पड़ी।

GRAP-IV के बाद स्कूलों में क्या बदला?

रिपोर्ट के मुताबिक GRAP-IV (यानी प्रदूषण रोकने के सबसे सख्त कदम) लागू होने के दो दिन बाद नोएडा के स्कूलों में “मिश्रित” स्थिति दिखी। कुछ स्कूलों ने बच्चों को घर से पढ़ाने का विकल्प दिया, जबकि कुछ जगह बच्चों को स्कूल आना पड़ा, क्योंकि वहां ऑनलाइन पढ़ाई कराना संभव नहीं था। कई माता-पिता ने खराब हवा को देखते हुए बच्चों को स्कूल भेजने से परहेज भी किया, इसलिए स्कूल बसें भी काफी खाली नजर आईं।

यह स्थिति सुनने में साधारण लगती है, लेकिन असल में यह उन परिवारों की रोजमर्रा की परेशानी है जिनके लिए हर दिन की योजना “स्कूल खुलेगा या बंद होगा” पर टिक जाती है। छोटे बच्चों के साथ तो दिक्कत और बढ़ जाती है, क्योंकि उन्हें स्क्रीन पर लंबे समय तक बैठाना भी आसान नहीं होता।

सेक्टर 50 का NGO स्कूल: ऑनलाइन पढ़ाई क्यों मुश्किल है?

रिपोर्ट में नोएडा के सेक्टर 50 में चल रहे “अपना स्कूल” का जिक्र है, जो यूपी बोर्ड से जुड़ा है और एक NGO द्वारा चलाया जाता है। यह स्कूल किराये की बिल्डिंग में चलता है और आसपास की झुग्गियों में रहने वाले बच्चों के लिए काम करता है। स्कूल की प्रिंसिपल मालविका सिंह के मुताबिक उन्होंने क्लास 6 और उससे ऊपर के बच्चों के लिए टाइम टेबल बदला और सोमवार को क्लास 10 बजे से शुरू की।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि स्कूल ने कक्षा 5 तक के बच्चों के लिए स्कूल पूरी तरह बंद कर दिया, क्योंकि उनके लिए ऑनलाइन पढ़ाई कराना संभव नहीं है। प्रिंसिपल के मुताबिक बच्चों के माता-पिता अधिकतर दिहाड़ी मजदूर हैं और कई घरों में मोबाइल फोन जैसी सुविधा नहीं है, इसलिए ऑनलाइन क्लास चलाना “बड़े स्कूलों” जितना आसान नहीं होता। रिपोर्ट के अनुसार, कई अभिभावकों को सरकारी सर्कुलर की जानकारी भी नहीं थी, इसलिए छोटे बच्चे सोमवार को स्कूल पहुंच गए और फिर उन्हें वापस भेजकर बताया गया कि उनके लिए स्कूल बंद है।

यह पहलू बहुत जरूरी है, क्योंकि हर बार जब आदेश आता है—“ऑनलाइन कर दीजिए”—तो मान लिया जाता है कि हर बच्चे के पास फोन, इंटरनेट और घर में पढ़ने का माहौल मौजूद होगा। असल जिंदगी में कई बच्चों के लिए स्कूल ही सबसे स्थिर जगह होता है, जहां उन्हें पढ़ाई के साथ रूटीन भी मिलता है।

प्राइवेट स्कूलों में हाइब्रिड का असर: क्लास खाली, बसें भी खाली

रिपोर्ट के मुताबिक सेक्टर 50 के कोठारी इंटरनेशनल स्कूल के बाहर स्कूल बसें खड़ी थीं, लेकिन उनमें सीटें ज्यादातर खाली दिखीं, क्योंकि स्कूल ने हाइब्रिड मोड अपनाया था। इसी तरह कुछ CBSE से जुड़े प्राइवेट स्कूलों में भी क्लासरूम काफी खाली रहे और बहुत कम बच्चे स्कूल आए।

एक स्कूल की प्रिंसिपल ने बताया कि उन्हें जिला प्रशासन से शाम करीब 5 बजे नोटिस मिला, जिसके बाद माता-पिता को मैसेज भेजा गया। रिपोर्ट के अनुसार, कई स्कूलों में कक्षा 5 तक के लिए ऑनलाइन मोड कर दिया गया और बाकी कक्षाओं के लिए माता-पिता पर छोड़ दिया गया कि वे बच्चों को स्कूल भेजना चाहते हैं या नहीं। स्कूलों का कहना है कि वे पढ़ाई “जैसे चल रही थी” वैसे ही चला रहे हैं—बस मोड में लचीलापन रखा गया है।

यहां एक अलग परेशानी भी है—बार-बार मोड बदलने से बच्चों की पढ़ाई का फ्लो टूटता है। कभी स्कूल, कभी ऑनलाइन, कभी हाइब्रिड—इसमें बच्चे भी कंफ्यूज होते हैं और माता-पिता भी, खासकर जब घर में दोनों कामकाजी हों या जब परीक्षा करीब हो।

माता-पिता की चिंता: सेहत बनाम पढ़ाई

रिपोर्ट में एक अभिभावक का बयान है कि बच्चों की सेहत चिंता का विषय है, लेकिन क्लास मोड बार-बार बदलने से मैनेज करना मुश्किल हो जाता है, और क्योंकि एग्जाम पास हैं इसलिए बेहतर व्यवस्था की उम्मीद है। यह बात आज के समय की सबसे बड़ी सच्चाई है—माता-पिता बच्चों को बीमार भी नहीं देखना चाहते, और पढ़ाई भी छूटे यह भी नहीं चाहते। ऐसे में कई लोग “कम रिस्क” वाला रास्ता चुनते हैं, यानी बच्चे को घर पर ही रखते हैं, लेकिन फिर ऑनलाइन पढ़ाई का बोझ भी उसी घर पर आ जाता है।

यह मामला सिर्फ “स्कूल का आदेश” नहीं है, यह घर के पूरे रूटीन का मामला है—कौन बच्चे को ऑनलाइन बैठाएगा, किसका फोन लगेगा, इंटरनेट चलेगा या नहीं, और पढ़ाई ठीक से हो भी रही है या नहीं। छोटे बच्चों में तो यह चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि उन्हें समझाना, बैठाना और ध्यान लगवाना खुद एक काम बन जाता है।

नर्सरी-KG पूरी तरह बंद क्यों?

रिपोर्ट के अनुसार, शहर के कई प्राइवेट प्री-प्राइमरी और किंडरगार्टन स्कूल पूरी तरह बंद रहे और सारी गतिविधियां ऑनलाइन शिफ्ट कर दी गईं, क्योंकि छोटे बच्चे ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं। Euro Kids की प्रिंसिपल पूजा काशव ने बताया कि उनके स्कूल में 6 साल तक के बच्चे पढ़ते हैं और उन्होंने ऑनलाइन सेशन का समय भी कम किया—पहले 3 घंटे, अब 2 घंटे—ताकि बच्चों की आंखों पर असर कम हो।

यह फैसला कई परिवारों के लिए राहत भी है और परेशानी भी। राहत इसलिए कि छोटे बच्चों का बाहर निकलना कम होगा, और परेशानी इसलिए कि छोटे बच्चों को स्क्रीन के सामने बैठाना, खासकर लगातार कई दिनों तक, बहुत मुश्किल हो जाता है।

आगे की जरूरत: एक जैसी और साफ व्यवस्था

रिपोर्ट से साफ है कि नोएडा में स्कूलों ने हालात के हिसाब से अपने-अपने तरीके निकाले—कहीं ऑनलाइन, कहीं हाइब्रिड, कहीं छोटे बच्चों के लिए छुट्टी। लेकिन असली जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जो हर तरह के स्कूल—बड़े, छोटे, NGO वाले, और झुग्गी इलाकों के बच्चों—सबके लिए काम कर सके। जब तक यह नहीं होगा, तब तक हर बार प्रदूषण बढ़ने पर सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं बच्चों का होगा जिनके पास विकल्प सबसे कम हैं।

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