ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश और देश के राजनीतिक परिदृश्य में इन दिनों अलंकार अग्निहोत्री नाम एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन अब अलग रूप में। बरेली के पूर्व PCS अधिकारी रहे अलंकार अग्निहोत्री ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से वाराणसी में मुलाकात के बाद अपने विचारों को सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने रखा है। इस मुलाकात के बाद उन्होंने एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ एक देशव्यापी आंदोलन चलाने का ऐलान किया है।
अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अग्निहोत्री ने कहा है कि अगर केंद्र सरकार 6 फरवरी 2026 तक एससी-एसटी एक्ट को वापस नहीं लेती, तो वह 7 फरवरी से दिल्ली कूच सहित देशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। यह बयान आज राजनीति और सामाजिक बहसों का हिस्सा बन चुका है।
किस बात से भड़के अलंकार अग्निहोत्री?
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि अलंकार अग्निहोत्री किस कारण से सुर्खियों में आए। वे पहले बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट (PCS अधिकारी) थे, लेकिन कुछ विवादों के चलते उन्होंने अपना पद छोड़ दिया। खासकर प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ हुई कथित घटना को लेकर उन्होंने सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए थे, जिससे राजनीतिक माहौल गरमाया।
इसके अलावा, वे नए यूजीसी नियमों और कुछ अन्य सरकारी नीतियों पर भी असंतोष जता चुके हैं। उनका कहना रहा है कि ये नियम और व्यवस्थाएं समाज के लिए लाभकारी नहीं हैं, बल्कि कुछ वर्गों को प्रमुखता देती हैं जिससे असंतुष्ट वर्गों में फैलाव बढ़ता जा रहा है।
एससी-एसटी एक्ट पर तीखा हमला
सबसे विवादित बिंदु रहा है एससी-एसटी एक्ट। इस कानून को 1989 में लागू किया गया था ताकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ होने वाले अत्याचार के मामलों का शीघ्र और प्रभावी न्याय सुनिश्चित किया जा सके। लेकिन अलंकार अग्निहोत्री ने इस कानून को “काला कानून” बताया है और आरोप लगाया है कि यह बहुत अधिक दुरुपयोग का कारण बन रहा है। उनके मुताबिक इस एक्ट के तहत लगभग 95% मामले फर्जी होते हैं, जिनसे समाज के अन्य वर्गों को मानसिक और सामाजिक दबाव झेलना पड़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज भारत की लगभग 85% आबादी इस कानून से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रही है और जरूरत है कि इसे या तो सुधारा जाए या हटाया जाए। उनके इस बयान ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही क्षेत्रों में हलचल पैदा कर दी है।
शंकराचार्य से मुलाकात: भावनात्मक या विचारधारात्मक कदम?
अलंकार अग्निहोत्री ने अपनी रणनीति और भविष्य की दिशा के बारे में बात करते हुए कहा है कि उनकी मुलाकात शंकराचार्य से व्यक्तिगत आशीर्वाद या कोई धार्मिक समर्थन पाने के लिए नहीं थी, बल्कि यह विचारधारात्मक रूप से एक बड़ा कदम है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के भीतर एक वैचारिक संघर्ष बताया और कहा कि वो किसी संगठन या धर्म विशेष के लिए यह आंदोलन नहीं कर रहे, बल्कि इसे समाज में एक बड़े बदलाव की शुरुआत मानते हैं।
मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि इस मुलाकात में शंकराचार्य ने भी अलंकार अग्निहोत्री को समर्थन दिया है और कुछ मामलों में गुरुवार के बाद उनके रुख को मजबूत किया है। ऐसे में यह खबर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समूहों के बीच बहस का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
देशव्यापी आंदोलन की तैयारी
अलंकार अग्निहोत्री ने 6 फरवरी को अंतिम समय-सीमा बताई है। उनका कहना है कि यदि केंद्र सरकार ने तब तक इस एक्ट को वापस नहीं लिया या उसके सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो वह 7 फरवरी से देशभर में आंदोलन करेंगे और लोगों को दिल्ली की ओर कूच करने का आह्वान करेंगे।
उनके इस बयान को सोशल मीडिया और समाचार चैनलों में व्यापक चर्चा मिल रही है। कुछ लोगों ने इस कदम को स्वागत के साथ देखा है, जबकि दूसरी ओर आलोचना और सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या यह कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत है या नहीं।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के आंदोलन और विवाद राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह विरोध केवल एक व्यक्ति का निजी संघर्ष नहीं है, बल्कि यह उन वर्गों के विचारों को दर्शाता है जिन्हें लगता है कि किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा है। लेकिन कई विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जताते हैं कि इस तरह का संघर्ष अगर हिंसक रूप ले, तो उसका असर समाज के कमजोर तबके पर भी पड़ेगा, जो पहले से ही सामाजिक न्याय की जरूरत महसूस करते हैं।
इसके अलावा, 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए ऐसे आंदोलनों का राजनीतिक असर भी अहम माना जा रहा है। राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपनी शक्ति बढ़ाने या विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं।
क्या यह आंदोलन सफल होगा?
अलंकार अग्निहोत्री के बयान और उनकी योजना अब लोगों के बीच बहस का विषय बन चुकी है। कुछ लोग इसे समाज के लिए दिक्कत का कारण बताते हैं, जबकि अन्य इसे देश में बदलाव की जरूरत मानते हैं। आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह आंदोलन सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़ता है या वास्तविक रूप में सड़कों पर जनभागीदारी बनाता है।
अंततः यह मामला यह सवाल उठाता है कि किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा है या नहीं, और यदि हो रहा है तो उसके लिए क्या समाधान मौजूद हैं। इस बहस का असर आने वाले समय में समाज, राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर साफ नजर आएगा।
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