ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। इस बार सियासी बहस का नया मुद्दा है एसआईआर (Special Intensive Revision) के तहत मतदाता सूची में दर्ज फॉर्म-7 डेटा की बढ़ती संख्या, जिसने समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव की चिंता को बढ़ा दिया है। इस विवाद ने मतदाता सूची, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं — और आम लोगों के लिए भी यह विषय धीरे-धीरे महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।
एसआईआर क्या है और क्यों जरूरी है?
हर चुनाव से पहले भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची का सर्वेक्षण और संशोधन किया जाता है। इसी प्रक्रिया को Special Intensive Revision (SIR) कहते हैं। इसका लक्ष्य है पुरानी सूचियों को अपडेट करना, डुप्लिकेट नाम हटाना, मृत या गैर-योग्य मतदाताओं को सूची से हटाना और नए योग्य मतदाताओं को जोड़ना। यह प्रक्रिया हर राज्य में समय-समय पर होती है ताकि वोटर लिस्ट निष्पक्ष और सटीक रहे। लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश के SIR डेटा में अचानक वृद्धि और फॉर्म-7 के बढ़ते मामलों ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।
डेटा में अचानक बढ़ोतरी: क्या है समस्या?
1 फरवरी 2026 तक के आंकड़ों से पता चलता है कि जनवरी के महीने में फॉर्म-7 आवेदन की संख्या लगातार बढ़ी है। शुरुआत में जहां 9 जनवरी को सिर्फ 175 आवेदन दर्ज हुए थे, वहीं महीने के अंत तक यह संख्या 8,503 तक पहुँच गई, जो एक दिन में अब तक का सबसे अधिक रिकॉर्ड है।
पिछले दिनों में कुल 57,173 फॉर्म-7 आवेदन दर्ज किए जा चुके थे, जिसमें कई अपवोटर नाम हटाने या आपत्ति जताने के लिए फॉर्म जमा किए गए। यह अचानक वृद्धि राजनीतिक स्तर पर चिंता का विषय बन गई है — खासकर जब इसे मतदाता सूची से नाम हटाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
फॉर्म-7 क्या है और इसके दुरुपयोग पर विवाद
फॉर्म-7 ECI द्वारा जारी किया गया एक ऐसा आवेदन है जिसका प्रयोग मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के नाम के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने या नाम हटाने के लिए किया जाता है। इसे आमतौर पर तब इस्तेमाल किया जाता है जब:
• कोई मतदाता सूची में डुप्लिकेट है।
• व्यक्ति मर चुका है।
• वह स्थान-स्थानांतरित हो गया है।
• अन्य कारण जिनसे वह सूची में नाम न होना चाहिए महसूस होता है।
लेकिन इस बार फॉर्म-7 के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव का कहना है कि कई मामलों में फॉर्म-7 को गलत तरीकों से वोटर के नाम हटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उनके अनुसार, कई ऐसे फॉर्म बिना व्यक्ति की जानकारी या सहमति के भरे जा रहे हैं और इसीलिए यह लोकतंत्र के लिए एक बड़ा धोखा बनता जा रहा है। उन्होंने इस पर कानूनी संज्ञान लेने और ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने की मांग भी उठाई है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
अखिलेश यादव न सिर्फ फॉर्म-7 के बढ़ते उपयोग पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि उन्होंने इस प्रक्रिया को मतदाता सूची से विपक्ष के वोटरों को हटाने की साजिश भी बताया है। उनका आरोप है कि यह जरूरी नहीं कि हर आवेदन वास्तविक मतदाता के स्वेच्छा से भरा गया हो — बल्कि कुछ मामलों में जाली दस्तखत या संदिग्ध दावा करने वालों द्वारा यह फॉर्म भरे जा रहे हैं।
वहीं विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता हर पार्टी के लिए जरूरी है, लेकिन यह भी जरुरी है कि सभी पक्ष वैधानिक प्रक्रियाओं और आंकड़ों की जांच-परख करें।
मतदाता सूची और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर
मतदाता सूची किसी भी चुनाव की रीढ़ होती है। अगर सूची में अनावश्यक नाम शामिल हैं या पात्र मतदाताओं के नाम हट रहे हैं, तो इससे चुनावी परिणामों पर प्रत्यक्ष असर पड़ने की संभावना रहती है।
• इससे मतदाता विश्वास कम हो सकता है।
• चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं।
• राजनीतिक दलों के बीच तनाव बढ़ सकता है।
ऐसे में SIR और फॉर्म-7 जैसे मुद्दों की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना अति आवश्यक है।
सपा की प्रतिक्रिया और आगे की रणनीति
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ऐसे मामलों की जांच होनी चाहिए और यदि किसी ने जानबूझकर फॉर्म-7 का दुरुपयोग किया है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। वे मतदाताओं से भी अपील कर रहे हैं कि वे अपनी सूची में नाम की जांच अवश्य करें ताकि किसी को गलती से या जानबूझकर हटाया न जा सके। साथ ही उन्होंने स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर संदिग्ध मामलों की रिपोर्टिंग और कार्रवाई की अपील भी की है।
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