ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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प्रयागराज में हर साल आयोजित होता माघ मेला 2026 इस बार शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए विवाद के कारण सुर्खियों में है। माघ मेला हिंदुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है जहाँ लाखों श्रद्धालु गंगा में पवित्र स्नान करते हैं। इस मेले का महत्व सिर्फ आध्यात्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी है।
इस बार विवाद तब शुरू हुआ जब अविमुक्तेश्वरानंद के मौनी अमावस्या के दिन स्नान से रोकने को लेकर प्रशासन और उनके बीच टकराव हुआ। प्रशासन ने स्वामी के प्रस्तावित स्नान को रोक दिया, जिससे अफ़रा-तफरी और तनाव दोनों पैदा हो गए। इसका असर धार्मिक समुदाय में व्यापक रूप से देखा जा रहा है।
क्या था विवाद का मूल कारण?
माघ मेला 2026 के दौरान पुर्नस्थापित आयोजन स्थल पर अविमुक्तेश्वरानंद के साथ विवाद तब और बढ़ा जब उन्होंने सुरक्षा नियमों और प्रशासन के फैसलों पर सवाल उठाए। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें दो नोटिस भी दिए गए, एक गैरकानूनी तरीके से पालकी से प्रवेश के बारे में और दूसरा सुविधाएँ वापस लेने के बारे में 24 घंटे के भीतर जवाब देने का आदेश था। स्वामी ने इसका विरोध किया और कानूनी नोटिस भी भेजा।
इसके चलते प्रशासन और संतों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी, जिससे माहौल तनावपूर्ण रहा। यह टकराव धार्मिक और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच एक बड़ा मुद्दा बन गया है।
सीएम योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा?
इसी विवाद के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोनीपत में एक कार्यक्रम के दौरान एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि धर्म और राष्ट्र किसी संत के लिए सबसे ऊपर होते हैं। उनके अनुसार, संत का स्वाभिमान उसका राष्ट्र होता है और उसके लिए धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं होता।
योगी ने यह भी कहा कि ऐसे बहुत से “कालनेमि-जैसी ताकतें” सक्रिय हैं जो धर्म का चोला पहनकर सनातन धर्म को भीतर से कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने समाज को ऐसे लोगों के प्रति सतर्क रहने की चेतावनी दी। इस कथन से यह साफ़ संकेत मिलता है कि सीएम विवाद को धार्मिक भावना से जोड़कर देख रहे हैं और इसे सनातन धर्म के खिलाफ साजिश के रूप में नहीं लेना चाहते।
योगी ने कहा कि चार करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं ने 18 जनवरी को माघ मेले में स्नान करके अपनी आस्था दिखाई, जो समाज में समरसता का प्रतीक है।
धर्म और राष्ट्र: योगी का नजरिया
योगी के बयान का केंद्रीय संदेश यह है कि धर्म किसी भी संत का निजी स्वामित्व नहीं है बल्कि वह राष्ट्र और समाज का साझा तत्व है। उनके शब्दों में, धर्म और राष्ट्र की गरिमा बनाए रखना हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है, विशेषकर उन लोगों की जो समाज में धार्मिक नेतृत्व का दावा करते हैं।
उनका कहना था कि सनातन धर्म की विरासत में नाथ पंथ जैसे धर्मगुरु सदैव प्रेरणा के स्रोत रहे हैं और समाज को एकजुट करने का काम किया है। योगी ने यह भी जोड़ा कि आज देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में “एक भारत श्रेष्ठ भारत” की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
रणनीतिक ढांचा और राजनीति का प्रभाव
योगी आदित्यनाथ की प्रतिक्रिया केवल धार्मिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें राजनीतिक संदेशों का भी समावेश है। उन्होंने यह इंगित किया कि सनातन धर्म के प्रतीक स्थलों और परंपराओं को कोई भी बाधित नहीं कर सकता। यह बयान ऐसे समय में आया है जब सम्पूर्ण देश धार्मिक संवेदनशीलता और सांप्रदायिक स्थायित्व पर विशेष ध्यान दे रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस तरह के बयान अक्सर उस व्यापक संदर्भ का हिस्सा होते हैं जिसमें धर्म और राजनीति का मेल मौजूदा समय में बढ़ता दिख रहा है। हालांकि सीएम ने किसी नाम का जिक्र नहीं किया, उन्होंने “कालनेमि” का उल्लेख कर उन तत्वों के प्रति चेतावनी दी जो समाज में भ्रम या खंडन फैला सकते हैं।
धर्मगुरुओं और संतों की प्रतिक्रिया
योगी के बयान के बाद अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने सीएम का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सभी संत समान हैं, और मुख्यमंत्री खुद एक संत हैं, जिनका सम्मान करना चाहिए। उनके अनुसार अगर संतों को सम्मान नहीं दिया जाता तो कौन उसे देगा।
इसी बीच कुछ अन्य संतों ने भी अविमुक्तेश्वरानंद की आलोचना की है और कहा कि वे धार्मिक और विकासात्मक कार्यों में बाधा डालते हैं। एक संत ने कहा कि माघ मेला आध्यात्मिक जगत का सूर्य है और ऐसे किसी भी प्रभाव को रोकना चाहिए।
कानूनी मुद्दे और प्रशासन की भूमिका
विवाद का एक पहलू प्रशासन और संत के बीच कानूनी लड़ाई भी है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकारी आदेशों और नोटिसों के खिलाफ कानूनी नोटिस भेजा है और 24 घंटे के भीतर उत्तर देने का अल्टीमेटम दिया है। इससे स्पष्ट है कि मामला सिर्फ धार्मिक विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक और कानूनी मोर्चे पर भी पहुँच गया है।
निर्देशों के खिलाफ यह कदम यह दर्शाता है कि विवाद कई स्तरों पर फैल चुका है, और भविष्य में इसे अदालतों में भी देखा जा सकता है अगर पक्ष विवाद का समाधान नहीं करते।
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