ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
10 नवंबर की शाम दिल्ली के लाल किले के पास हुए भीषण विस्फोट ने कई परिवारों की जिंदगी बदल दी। इस आतंकी हमले में 12 लोग मारे गए और कई घायल हुए। अब पीड़ित परिवारों का दर्द सामने आया है, जिन्होंने अपने प्रियजन खो दिए। उनका कहना है कि यह कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश थी।
दीक्षा सिंघल का दुख: ससुर की मौत का सदमा
दीक्षा सिंघल ने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा, “जो हमारे पास था, वो हम खो चुके हैं। अब सरकार से क्या मांग करें? न्याय किसके लिए मांगें?” उनके ससुर लोकेश अग्रवाल इस ब्लास्ट में मारे गए। लोकेश की तरह यूपी के पांच लोग इस हमले में अपनी जान गंवा बैठे।
दीक्षा बताती हैं कि उनके ससुर 10 नवंबर की सुबह बस से दिल्ली गए थे। उनका उद्देश्य हॉस्पिटल में भर्ती उनकी पत्नी दीक्षा की मां से मिलना था। शाम 5:30 बजे उन्होंने परिवार को वीडियो कॉल की और कहा कि वह अपने दोस्त अशोक से मिलने जा रहे हैं।
मेट्रो स्टेशन पर 10 मिनट का फासला और अचानक धमाका
दीक्षा के अनुसार, लोकेश और उनकी बहन ने लाल किला मेट्रो स्टेशन पर दोस्त अशोक का इंतजार किया। 10 मिनट बाद ही धमाका हुआ, जिसमें लोकेश और अशोक दोनों मारे गए। लोकेश की पहचान अंगूठी और जैकेट के जरिए की गई। उनके शव का आधा चेहरा बुरी तरह क्षतिग्रस्त था। दिल्ली पुलिस ने शव पैक कर परिवार को सौंपा, इसलिए उन्हें शव की पूरी स्थिति देखने का मौका नहीं मिला।
अशोक सिंह: परिवार का सिरमौर
अशोक दिल्ली में DTC में बस कंडक्टर थे। वह पत्नी सोनम और तीन बच्चों के साथ दिल्ली के जगतपुरी में रहते थे। ब्लास्ट के दिन वह लोकेश को रिसीव करने मेट्रो स्टेशन गए थे। धमाके में उनका चेहरा खून से सना हुआ था और पत्नी सोनम व बूढ़ी मां के सामने उनका निधन हुआ। सोनम ने बताया, “हमारे पति रोजाना सुबह 5:30 बजे ड्यूटी पर निकलते और रात 12 बजे घर लौटते। लेकिन इस दिन उनका कोई पता नहीं चला। रात को पता चला कि वह इस दुनिया में नहीं रहे।”
मोहसिन: रिक्शे से सवारियां लेकर जा रहे थे लाल किले
मेरठ जिले के इस्लामनगर निवासी मोहसिन मलिक भी इसी धमाके में मारे गए। मोहसिन दिल्ली के जामा मस्जिद के पास किराए के मकान में रहते थे और ई-रिक्शा चलाते थे। उनकी मौत की सूचना परिवार को रात करीब 3 बजे मिली। उनकी पत्नी सुल्ताना और 2 बच्चे अब शोकाकुल हैं। उनकी मां संजीदा बताती हैं कि मोहसिन दो साल पहले ही दिल्ली आए थे और परिवार से दूर रहकर ईमानदारी से काम कर रहे थे।
दिनेश कुमार: प्रिंटिंग प्रेस में काम करने वाले पिता
गणेशपुर, श्रावस्ती निवासी दिनेश कुमार भी इस ब्लास्ट का शिकार बने। वह दिल्ली में प्रिंटिंग प्रेस में काम करते थे और अपनी पत्नी रीना देवी और तीन बच्चों के लिए मेहनत कर रहे थे। रीना देवी ने बताया कि वह 10 दिन पहले ही दिल्ली गए थे। उनके बच्चों के सामने अब पिता का खालीपन और दर्द है।
नौमान: दुकान से लौटते हुए सड़क पार करते समय मारा गया
शामली के झिंझाना कस्बे के रहने वाले नौमान भी ब्लास्ट का शिकार हुए। वह अपने भाई अमन के साथ दुकान का सामान खरीदकर लौट रहे थे। धमाके में नौमान की मौके पर ही मौत हो गई जबकि अमन गंभीर रूप से घायल हुआ।
पीड़ित परिवारों की प्रतिक्रिया और भावनाएं
पीड़ित परिवारों का कहना है कि यह हमला सोची-समझी आतंकी साजिश थी। वे अपने प्रियजनों को खोकर गम और गुस्से में हैं। सभी परिवार चाहते हैं कि इस तरह के हादसे कभी किसी के साथ न हों। दीक्षा सिंघल कहती हैं, “वो जिंदा होते तो उनके लिए न्याय मांगते। इतना जरूर करेंगे कि जैसा हमारे साथ हुआ, भगवान न करे कभी किसी के साथ हो।”
10 नवंबर का लाल किला धमाका सिर्फ संख्याओं में मृतकों की खबर नहीं है, बल्कि यह परिवारों की जिंदगी का बर्बादी का प्रतीक है। दीक्षा सिंघल, अशोक सिंह की पत्नी सोनम, मोहसिन की पत्नी सुल्ताना और अन्य परिवारों के लिए यह दर्दनाक पल हमेशा याद रहेगा।
यह हमले का असर सिर्फ शारीरिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक और मानसिक चोट भी है। परिवारों की उम्मीद और न्याय की मांग अब सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों और सरकार पर निर्भर है।
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