प्रयागराज माघ मेले में तीखे विवाद के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को दूसरा नोटिस
प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेले प्रशासन के बीच विवाद बढ़ गया है। प्रशासन ने उन्हें दूसरा नोटिस भेजकर भूमि आवंटन रद्द करने और मेले से आजीवन प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है। दोनों पक्षों ने एक दूसरे को नोटिस भेजे हैं और मामला अब कानूनी व धार्मिक तरीके से गरमाया है।
 प्रयागराज माघ मेले में तीखे विवाद के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को दूसरा नोटिस
  • Category: उत्तर प्रदेश

प्रयागराज के प्रसिद्ध माघ मेले में इन दिनों एक बड़ा विवाद छिड़ा हुआ है, जो केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा बल्कि प्रशासन और एक प्रमुख संत के बीच टकराव का रूप ले चुका है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ मेले के अधिकारियों ने एक और नोटिस जारी किया है, जिसमें उनके द्वारा दी गई भूमि आवंटन को रद्द करने और उन्हें माघ मेले से आजीवन प्रतिबंधित करने तक की चेतावनी दी गई है।

 

ये नोटिस मौनी अमावस्या के दौरान हुए एक विवाद का हवाला देते हुए जारी किया गया है, जिसमें कहा गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद के द्वारा सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग में दिखाई दे रहे घटनाक्रम और भीड़ के बीच किए गए कुछ कृत्यों के कारण मेला प्रशासन की व्यवस्था प्रभावित हुई और भड़काव की स्थिति बन सकती थी।

 क्या है विवाद का मूल कारण?

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब स्वतंत्र रूप से चल रहे धार्मिक आयोजन के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने “शंकराचार्य” का पद अपने नाम के आगे लिखना शुरू किया। प्रशासन का कहना है कि इस पद का उपयोग करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक अपील (Civil Appeal Nos.) है। शीर्ष अदालत ने 16 अक्टूबर 2022 को आदेश दिया था कि जब तक मामला विचाराधीन है तब तक ज्योतिषपीठ में किसी भी नए शंकराचार्य के पद की पुष्टि नहीं की जा सकती। लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर पर इस पद का उपयोग किया, जिससे प्रशासन ने पहले ही एक नोटिस जारी किया था और अब दूसरा ज्यादा सख्त नोटिस दिया गया है।

 

नया जारी नोटिस केवल पद के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तक कहा गया है कि अगर अविमुक्तेश्वरानंद के कारण मेले की व्यवस्था बाधित होती रही तो उनकी संस्था को आवंटित भूमि और सुविधाओं को निरस्त किया जा सकता है और उन्हें माघ मेले में प्रवेश करने से हमेशा के लिए प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव है।

 मेला प्रशासन का तर्क कैसा है?

प्रशासन का कहना है कि मौनी अमावस्या के दिन संगम तट पर भारी भीड़ थी, और उस भीड़ के प्रबंधन के दौरान अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों द्वारा कुछ ऐसे कदम उठाये गए जो संयम और आदेश के खिलाफ माने जा सकते हैं। इसके तहत प्रशासन ने यह कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद की गाड़ी को लेकर संगम नोड तक पहुंचने की कोशिश और भारी भीड़ के बीच बैरियर तोड़ने का प्रयास व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता था। ऐसे में सुरक्षा और भीड़ के नियंत्रण के लिहाज से यह कदम लिया जा रहा है।

 स्वामी का जवाब: प्रशासन पर तीखी प्रतिक्रिया

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जारी नोटिस पर तीखी प्रतिक्रिया भी दी है। उनके मीडिया प्रभारी शैलेन्द्र योगिराज ने बयान जारी करते हुए प्रशासन पर दुर्भावनापूर्ण और भ्रामक आरोप लगाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि नोटिस में जो बातें लिखी गई हैं वे सत्य के विपरीत हैं और मनगढ़ंत बताई गई हैं। उनका यह भी कहना है कि उनके शिविर के पास “बग्घी” (पालकी) जैसी कोई चीज मौजूद ही नहीं थी, जैसा प्रशासन ने आरोप लगाया है।

 

स्वामी की ओर से यह भी कहा गया है कि अगर प्रशासन भूमि आवंटन रद्द करना चाहता है तो वह कर सकता है, लेकिन पहले यह स्पष्ट बताना चाहिए कि शुरुआत में भूमि आवंटन क्यों और किस आधार पर दिया गया था। उनके इस विद्रोही अंदाज़ ने विवाद को और गहरा दिया है, और मामला अब कानूनी मोड़ ले सकता है।

 धार्मिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रिया

यह मामला केवल प्रशासन और एक संत के बीच का विवाद नहीं रह गया है। इसके सामाजिक‑धार्मिक प्रभाव भी दिखाई देने लगे हैं। प्रयागराज और आसपास के इलाकों में कुछ जगहों पर शंकराचार्य के समर्थन में बैनर और नाराज़गी भी देखने को मिल रही है, जिनमें कहा जा रहा है कि “शंकराचार्य का अपमान सहा नहीं जाएगा।”

 

कुछ अन्य संतों और प्रमुख धार्मिक नेताओं ने भी इस मामले पर बयान दिया है। जैसे कि जगद्गुरु रामभद्राचार्य और पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है, जिससे विवाद और धार्मिक संगठनों और मान्यताओं के बीच बहस का रूप ले चुका है।

 

समुदाय और श्रद्धालुओँ के बीच यह विवाद अलग‑अलग तरह से देखा जाता है — कई लोग इसे प्रशासन का कड़ा कदम मानते हैं, तो कुछ इसे धार्मिक आज़ादी में बाधा के रूप में देखने लगे हैं। इससे यह साफ है कि मामला सिर्फ नोटिस या व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसके विस्तृत प्रभाव महसूस किए जा रहे हैं।

 स्वामी का विरोध और विरोध का स्वरूप

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद केवल बैठक या नोटिस के खिलाफ passive reply नहीं दे रहे हैं। उन्होंने प्रशासन को अपना कानूनी नोटिस भी थमाया है, जिसमें उन्होंने 24 घंटे के अंदर जवाब देने को कहा है और यह चेतावनी दी है कि यदि नोटिस वापिस नहीं लिया गया तो वे कानूनी कार्रवाई करेंगे। ऐसा कदम पहले कभी नहीं देखा गया है और यह दर्शाता है कि मामला अब न्यायिक रूप से भी आगे बढ़ सकता है।

 

स्वामी की यह चुनौती प्रशासन के रवैये को सीधे सवालों के घेरे में लाती है और यह विवाद धार्मिक नेतृत्व, कानून और प्रशासनिक आदेश के बीच जटिल संबंध की ओर इशारा करता है।

 क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हो रहा है?

इस पूरे विवाद में एक बहुत बड़ा केंद्र बिंदु है सुप्रीम कोर्ट का आदेश। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के पद पर एक लंबित मामला के बावजूद किसी भी नए नियुक्ति को रोक दिया था। प्रशासन ने अपने नोटिस में इसी आदेश का हवाला दिया है और कहा है कि अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा पद का उपयोग करना अदालत के आदेश का उल्लंघन हो सकता है।

 

हालाँकि अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष यह है कि उन्हें पहले से ही शंकराचार्य के पद पर मान्यता दी जा चुकी थी और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से पहले ही इसे ग्रहण किया था, जिस पर प्रशासन भरोसा नहीं जताता। इस कारण यह मामला धार्मिक मान्यता, उपाधि और न्यायपालिका के आदेश के बीच उलझन में फँसा हुआ है, जिसका अंतिम फैसला कोर्ट के पास ही है।

 

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