ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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प्रयागराज में माघ मेले के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश सरकार तथा मेला प्रशासन आमने‑सामने हैं। यह मामला केवल धार्मिक मान्यता का नहीं, बल्कि कोर्ट के आदेश, शीर्ष अधिकारियों के फैसलों और धार्मिक सम्मान का भी है। इस विवाद ने साधु‑समाज, प्रशासन और आम जनता के बीच चर्चा का विषय बनकर देशभर में सुर्खियों में जगह बनाई है।
माघ मेले में नोटिस जारी: विवाद की शुरुआत
माघ मेले के दौरान प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस जारी किया जिसमें उन्हें 24 घंटे के अंदर यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि वे स्वयं को “शंकराचार्य” कैसे घोषित कर रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक अपील है जिसमें आदेश दिया गया है कि जब तक मामला पूरा नहीं निपटता, तब तक किसी धर्मगुरु को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में नहीं माना जाये। बावजूद इसके, स्वामी के शिविर पर शंकराचार्य लिखे बोर्ड लगे थे, जिस पर प्रशासन ने आपत्ति जताई है।
सुप्रीम कोर्ट आदेश का हवाला
प्रशासन ने अपने नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा साधु क्यों न हो, तब तक शंकराचार्य पद का दावा नहीं कर सकता जब तक कोर्ट की अपील अंतिम रूप से निपटाई न जाए। नोटिस में कहा गया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने नाम के सामने “शंकराचार्य” शब्द का उपयोग किया है, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करता।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विरोध
स्वामी जी ने प्रशासन के नोटिस पर कड़ा विरोध जताया है। उनके वकील ने कहा है कि नोटिस उनके सम्मान और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला है और यदि इसे 24 घंटे के अंदर वापस नहीं लिया गया, तो वे प्रशासन के खिलाफ कोर्ट में अवमानना की कार्रवाई करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यह विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले से पहले से जुड़ा हुआ है और प्रशासन इस प्रक्रिया में बाधा डाल रहा है।
कानूनी नोटिस उत्तर प्रदेश सरकार को
इस विवाद ने एक नया मोड़ लिया जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने वकील के माध्यम से योगी सरकार और मेला प्रशासन को कानूनी नोटिस भेजा। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि यदि उनका भेजा गया नोटिस वापस नहीं लिया जाता है, तो प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना सहित अन्य कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह पत्र प्रशासन की ओर से भेजे गए नोटिस को उनके नाम और छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया गया है।
स्वामी का पक्ष: धर्म और परंपरा की बात
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थकों का मानना है कि धार्मिक पद और परंपरा प्रशासन के आदेश से ऊपर है। उनका कहना है कि शंकराचार्य पद धार्मिक मान्यता पर आधारित है, जिसे सरकारी एजेंसियाँ नहीं तय कर सकतीं। वे यह भी कहते हैं कि उनका पट्टाभिषेक सालों पहले ही तय हो चुका था और इसलिए उनके खिलाफ नोटिस देना गलत है।
मेला प्रशासन की सुरक्षा चिंताएँ
प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया है कि स्वामी ने प्रशासन को अपनी स्नान सभा के बारे में पूर्व सूचना नहीं दी थी और केवल दो वाहनों की अनुमति मांगने का ही अनुरोध किया था, जिसे वे प्रशासन ने अस्वीकार कर दिया था। इस कारण प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से उन्हें स्नान स्थल पर जाने से रोका था।
धार्मिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
इस विवाद का असर केवल प्रशासन और स्वामी तक सीमित नहीं रहा है। कई संत समाज के लोग अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में भी सामने आए हैं। हरिद्वार और अन्य शहरों में प्रदर्शन हुए, जहां संतों ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मान को बनाए रखना चाहिए। उनके अनुसार, प्रशासन का रवैया संत समाज के सम्मान के खिलाफ है और इससे धार्मिक आस्था को चोट पहुँच सकती है।
राजनीतिक मुद्दों का उभार
इस विवाद को राजनीतिक रूप से भी जोड़ा जाने लगा है। कुछ राजनीतिक दलों ने प्रशासन की कार्रवाई की आलोचना की है और कहा है कि संतों के साथ ऐसा व्यवहार ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि संतों की धार्मिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना आवश्यक है और प्रशासन को इसका सम्मान करना चाहिए।
समाज में विभाजन की संभावना
इस विवाद ने समाज में भी दो धड़े बना दिए हैं — एक वह जो प्रशासन के फैसले का समर्थन कर रहा है, और दूसरा वह जो शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन कर रहा है। इससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा हो रही है, बल्कि धार्मिक समुदाय के भीतर भी गहरी चर्चा जारी है।
आगे क्या होगा?
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन और स्वामी के बीच यह विवाद कोर्ट तक जाएगा और क्या सुप्रीम कोर्ट इस मामले में साफ निर्देश देगा। जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक यह मामला देशभर की सुर्खियों में बना रह सकता है। दोनों पक्ष द्वारा दी गई कानूनी हलफनामों और नोटिसों से ही यह स्पष्ट है कि यह मामला सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि कानूनी और संवैधानिक मुद्दा भी बन गया है।
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