ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
बांग्लादेश इन दिनों राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल का सामना कर रहा है। कट्टरवाद और हिंसा लगातार बढ़ रही है, खासकर हिंदू समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। इस संवेदनशील समय में मंगलवार, 30 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया का ढाका में निधन हो गया। उनके बेटे और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) नेता तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे माने जा रहे हैं। फरवरी में बांग्लादेश में आम चुनाव होने हैं, इसलिए खालिदा जिया के निधन का राजनीतिक माहौल पर असर होना तय है।
खालिदा जिया का जीवन और राजनीतिक सफर
खालिदा जिया का जन्म खालिदा खानम पुतुल के नाम से हुआ था। 1947 के बंटवारे के बाद उनका परिवार दिनाजपुर शहर चला गया। उन्होंने दिनाजपुर मिशनरी स्कूल और दिनाजपुर गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की। उनकी शादी पाकिस्तानी सेना के कैप्टन जियाउर रहमान से हुई और 1965 में शादी के बाद वे पाकिस्तान चली गईं। उस समय उन्होंने अपना नाम बदलकर खालिदा जिया रख लिया।
खालिदा जिया तीन बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं। पहली बार 1991 में बनीं, जब वे बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। दूसरा कार्यकाल फरवरी 1996 में और तीसरा कार्यकाल 2001 से 2006 तक रहा।
हमेशा भारत विरोधी रुख
खालिदा जिया की राजनीति में भारत विरोधी दृष्टिकोण प्रमुख रहा। उनके कार्यकाल में पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी गई। उन्होंने भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि (1972) को ‘गुलामी की संधि’ करार दिया और 1996 की गंगा जल साझा संधि को ‘गुलामी का सौदा’ कहा। इसके अलावा, चटगांव हिल ट्रैक्ट्स शांति समझौते का भी उन्होंने विरोध किया।
उनके कार्यकाल में भारत विरोधी तत्वों को बढ़ावा मिला। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने ढाका में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। भारत के पूर्वोत्तर के उग्रवादी समूहों जैसे ULFA और NSCN
को
भी
बांग्लादेश
में
आश्रय
मिला।
भारत से संबंध और प्रमुख घटनाएँ
मार्च 2013 में जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ढाका दौरे पर थे, तब खालिदा जिया ने उनसे मिलने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस नीत दिल्ली सरकार बांग्लादेश की हसीना सरकार को ज्यादा तवज्जो दे रही है।
साल 2006 में खालिदा जिया ने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान भारत का दौरा किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात की। उनका सबसे चर्चित भारत दौरा अक्टूबर 2012 में हुआ, जब वे विपक्ष की नेता थीं।
राजनीतिक भविष्य और BNP की भूमिका
अब खालिदा जिया के निधन के बाद उनके बेटे तारिक रहमान BNP के नेतृत्व में राजनीतिक मोर्चा संभालेंगे। फरवरी में होने वाले आम चुनाव में उनका प्रभावी प्रदर्शन पूरे बांग्लादेश की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है।
बांग्लादेश इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। खालिदा जिया के निधन के साथ ही देश की राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी असर पड़ने की संभावना है। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि BNP और अन्य राजनीतिक दल देश की राजनीति में किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!