ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
दुनिया की राजनीति में कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो कभी “ठंडे” नहीं पड़ते। अमेरिका और ईरान का परमाणु कार्यक्रम वाला विवाद भी ऐसा ही है। कभी बातचीत का दौर चलता है, कभी धमकियों का, और बीच-बीच में पूरी दुनिया यही सोचती रहती है कि कहीं हालात हाथ से निकल न जाएं।
इस बार चर्चा जिनेवा में हुई बातचीत के बाद तेज हुई है। बाहर से देखने पर तस्वीर दो हिस्सों में बंटी लगती है—एक तरफ बातचीत में “कुछ आगे बढ़ने” की बात, दूसरी तरफ “अब तो जंग ही विकल्प है” जैसी बातें। आम लोगों के लिए ये समझना जरूरी है कि असल में हुआ क्या, और तनाव बढ़ने की वजह क्या है।
जिनेवा में बातचीत: “अप्रत्यक्ष” लेकिन अहम
रिपोर्ट
में बताया गया है कि जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्ट)
बातचीत हुई।
ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल्बुसैदी ने कहा कि बातचीत “कॉमन
लक्ष्य” और जरूरी तकनीकी मुद्दों की पहचान की दिशा में अच्छी प्रगति के साथ खत्म
हुई।
ऐसी बातचीत में कई बार भाषा बहुत सावधानी से चुनी जाती है। “प्रगति” का मतलब यह नहीं होता कि समझौता तय हो गया, बल्कि इतना कि दोनों पक्ष अभी टेबल पर हैं और कुछ बिंदुओं पर बात आगे बढ़ी है। इसी वजह से हर बयान का अपना अलग मतलब निकाला जाता है।
अमेरिका और ईरान के बयान अलग क्यों दिखे?
रिपोर्ट
के मुताबिक बातचीत के बाद अमेरिका ने कहा कि प्रोग्रेस हुई है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अभी भी काम करने की
जरूरत है।
ये फर्क बताता है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी घरेलू राजनीति और रणनीति को ध्यान में रखकर संदेश दे रहे हैं। अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि बातचीत चल रही है, जबकि ईरान यह संकेत देना चाहता है कि अभी कोई “फाइनल डील” जैसी चीज नहीं हुई है।
ईरान की मुख्य मांग: सैंक्शन में राहत
रिपोर्ट
में कहा गया है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बदले अमेरिकी
सैंक्शन में राहत चाहता है।
ईरान ने यह भी कहा कि विवाद सुलझाने के लिए कुछ “गाइडिंग
प्रिंसिपल्स” पर अमेरिका के साथ सहमति बन गई है।
यहीं से असल खेल शुरू होता है। ईरान कहता है—पहले राहत, फिर सीमाएं। अमेरिका कहता है—पहले ठोस कदम, फिर राहत। इस “पहले कौन” वाली बहस में अक्सर बातचीत अटक जाती है।
इजराइली अधिकारी का दावा: “जंग ही एक विकल्प”
रिपोर्ट
में एक इजराइली अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि अमेरिका ने इजराइल को
बताया कि वार्ता से कोई फायदा नहीं है और “युद्ध ही एकमात्र विकल्प” है।
उसी अधिकारी ने यह भी दावा किया कि जिनेवा में बस शर्तों वाले कागज
का आदान-प्रदान हुआ।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह “दावा” है, यानी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नीति की घोषणा नहीं। फिर भी ऐसे बयानों का असर बड़ा होता है, क्योंकि इससे बाजार, कूटनीति और क्षेत्रीय तनाव तीनों प्रभावित होते हैं।
ट्रंप का कड़ा रुख और दबाव की रणनीति
रिपोर्ट
के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले महीने ईरान पर हमला करने की
धमकी दी थी और चेतावनी दी कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी
सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है।
जब बातचीत के साथ-साथ सैन्य दबाव भी बढ़ता है, तो “गलतफहमी” का खतरा ज्यादा होता है। छोटे-से घटनाक्रम को भी दूसरा पक्ष हमला समझ सकता है। यही वजह है कि ऐसे समय में बैक-चैनल बातचीत और मध्यस्थ की भूमिका बहुत जरूरी हो जाती है।
बातचीत क्यों टूटती है, और फिर क्यों शुरू होती है?
अमेरिका-ईरान जैसे मामलों में भरोसा सबसे बड़ी कमी है। दशकों पुराना अविश्वास, क्षेत्रीय टकराव, और घरेलू राजनीति—सब मिलकर चीजों को जटिल बना देते हैं। कई बार दोनों पक्ष समझौता करना भी चाहते हैं, लेकिन अपने समर्थकों को यह “बेचना” मुश्किल होता है कि वे झुके नहीं।
आम दुनिया पर असर: तेल से लेकर सुरक्षा तक
इस तरह के तनाव का असर सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहता। मध्य पूर्व में अनिश्चितता बढ़ते ही ऊर्जा की कीमतों, शिपिंग रूट और निवेश पर असर पड़ता है। साथ ही इजराइल, खाड़ी देश और यूरोपीय देशों की सुरक्षा चिंताएं भी बढ़ जाती हैं।
अभी तस्वीर यही है कि बातचीत चल रही है, लेकिन भरोसे की दीवार बहुत ऊंची है। और जब किसी तरफ से “जंग” का शब्द खुले में आ जाए, तो दुनिया को सावधान हो जाना चाहिए।
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