ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
दिसंबर की ठंडी रात, अरब सागर की लहरों पर सन्नाटा और दूर कराची की चमकती रोशनी—पाकिस्तान को जरा भी अंदाजा नहीं था कि समंदर से ऐसी आग बरसने वाली है, जो उसके सबसे बड़े बंदरगाह की तस्वीर बदल देगी। कुछ ही घंटों में कराची पोर्ट धधक उठा, तेल के भंडार जलने लगे और पाकिस्तान की नौसैनिक ताकत बिखरने लगी। यह सिर्फ एक हमला नहीं था, बल्कि इतिहास का वह मोड़ था जिसने 1971 के युद्ध की दिशा ही बदल दी।
1971 का युद्ध और कराची की अहमियत
1971 में भारत–पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था। पूर्वी पाकिस्तान में हालात बेकाबू हो चुके थे और भारतीय सेना निर्णायक बढ़त बना रही थी। पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान को भरोसा था कि उसकी नौसेना कराची पोर्ट के सहारे सुरक्षित रहेगी। उस दौर में कराची पाकिस्तान की आर्थिक और सैन्य रीढ़ था—तेल, हथियार और रसद की सप्लाई यहीं से होती थी। भारत जानता था कि अगर कराची को झटका दिया गया, तो पाकिस्तान की युद्ध क्षमता को गहरी चोट लगेगी।
ऑपरेशन ट्राइडेंट की गुप्त तैयारी
भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल एस.एम. नंदा ने हालात को भांपते हुए एक साहसिक और बेहद गोपनीय योजना बनाई—ऑपरेशन ट्राइडेंट। इस मिशन के लिए मिसाइल बोट्स से लैस एक छोटा लेकिन तेज बेड़ा तैयार किया गया। ऑपरेशन की कमान कमांडर बबरू भान को सौंपी गई। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मंजूरी के बाद तय हुआ कि दुश्मन के दिल पर वार किया जाएगा, वो भी समुद्र के रास्ते।
वो रात जब कराची कांप उठा
3 दिसंबर 1971 की रात भारतीय नौसेना के जहाज चुपचाप कराची की ओर बढ़े। आधी रात के बाद जैसे ही ऑपरेशन शुरू हुआ, एंटी-शिप मिसाइलों ने कहर बरपा दिया। यह पहली बार था जब भारत ने इस तरह की मिसाइल तकनीक का इस्तेमाल किया। पाकिस्तानी नौसेना के जहाज पीएनएस खैबर, पीएनएस मुहाफिज और पीएनएस चैलेंजर तबाह हो गए। हथियार और ईंधन ले जा रहे जहाज जल उठे और कराची पोर्ट पर मौजूद ऑयल डिपो आग की चपेट में आ गया।
सात दिन तक जलता रहा कराची पोर्ट
कराची के तेल भंडारों में लगी आग इतनी भयानक थी कि उसे बुझाना लगभग नामुमकिन हो गया। लपटें मीलों दूर से दिखाई देती रहीं। पूरे सात दिनों तक जलते तेल ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और युद्ध क्षमता दोनों को भारी नुकसान पहुंचाया। नौसेना के छोटे जहाजों से बंदरगाह बचाने की कोशिशें नाकाम रहीं। एक ही रात में पाकिस्तान को ऐसा झटका लगा, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।
भारत की कीमत और रणनीतिक जीत
इस ऐतिहासिक ऑपरेशन में भारत को भी कीमत चुकानी पड़ी। INS खुकरी डूब गया और करीब 200 भारतीय नौसैनिक शहीद हुए। यह भारतीय नौसेना के इतिहास का बेहद दुखद क्षण था। लेकिन रणनीतिक रूप से ऑपरेशन ट्राइडेंट ने पाकिस्तान की समुद्री ताकत को लगभग खत्म कर दिया। इसके बाद ऑपरेशन पाइथन के जरिए बचे-खुचे ठिकानों पर भी प्रहार किया गया।
युद्ध का रुख बदला और नौसेना दिवस
कराची पोर्ट पर हमले के बाद पाकिस्तान पूरी तरह रक्षात्मक हो गया। समुद्र से सप्लाई रुकने का असर जमीनी मोर्चे पर भी साफ दिखा। नतीजा यह हुआ कि 16 दिसंबर 1971 को 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसी ऐतिहासिक नौसैनिक विजय की याद में भारत हर साल 4 दिसंबर को नौसेना दिवस मनाता है—एक ऐसी तारीख, जो भारतीय समुद्री शक्ति और साहस की कहानी बयां करती है।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!