ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) इस समय गंभीर सवालों के घेरे में है। एक तरफ मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET UG 2026 है, जो पेपर लीक और गड़बड़ियों की वजह से लगातार विवादों में बनी हुई है। दूसरी तरफ इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा JEE Main है, जिसकी विश्वसनीयता पर शायद ही कभी सवाल उठे हों। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दोनों परीक्षाएं एक ही एजेंसी कराती है, तो सुरक्षा व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई देता है? इसका जवाब दोनों परीक्षाओं के अलग-अलग परीक्षा पैटर्न और तकनीकी सिस्टम में छिपा है।
ऑफलाइन सिस्टम बनी सबसे बड़ी कमजोरी
NEET परीक्षा की सबसे बड़ी कमजोरी इसका पेन-पेपर मोड है। साल 2026 में भी यह परीक्षा ओएमआर शीट पर ऑफलाइन आयोजित की जा रही है। इस प्रक्रिया में लाखों प्रश्नपत्रों की छपाई करनी पड़ती है। फिर इन्हें सुरक्षित पैकिंग के साथ देशभर के हजारों परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रिंटिंग प्रेस, ट्रांसपोर्ट एजेंसियां, बैंक स्ट्रॉन्ग रूम और स्थानीय प्रशासन जैसे कई स्तर शामिल होते हैं। यही लंबी चेन पेपर लीक का सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। जितने ज्यादा लोग प्रक्रिया में शामिल होंगे, उतनी ही ज्यादा सेंधमारी की संभावना बढ़ती है।
JEE का डिजिटल सिस्टम क्यों ज्यादा सुरक्षित?
इसके बिल्कुल उलट JEE Main पूरी तरह कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) है। इसमें फिजिकल पेपर जैसी कोई चीज नहीं होती। प्रश्नपत्र एन्क्रिप्टेड डिजिटल सर्वर पर सुरक्षित रखे जाते हैं और परीक्षा शुरू होने से कुछ मिनट पहले ही सिस्टम में अनलॉक होते हैं। इसका मतलब यह है कि पेपर न तो रास्ते में चोरी हो सकता है और न ही किसी प्रिंटिंग प्रेस से बाहर निकल सकता है। यही डिजिटल सुरक्षा JEE को पेपर लीक माफियाओं से काफी हद तक सुरक्षित बनाती है।
एक दिन की परीक्षा बनती है बड़ा जोखिम
NEET का आयोजन पूरे देश में एक ही दिन और एक ही समय पर किया जाता है। यानी करीब 22 लाख छात्रों के लिए एक ही प्रश्नपत्र तैयार होता है। ऐसी स्थिति में यदि किसी एक सेंटर पर भी पेपर लीक हो जाए, तो पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठ जाते हैं। यही वजह है कि छोटी सी चूक भी राष्ट्रीय विवाद बन जाती है। वहीं JEE Main कई दिनों तक अलग-अलग शिफ्ट में आयोजित होती है। हर शिफ्ट का प्रश्नपत्र अलग होता है। अगर किसी एक शिफ्ट में कोई समस्या आ भी जाए, तो उसका असर पूरी परीक्षा पर नहीं पड़ता।
हजारों परीक्षा केंद्रों की चुनौती
NEET परीक्षा के लिए देशभर में करीब 5000 परीक्षा केंद्र बनाए जाते हैं। इनमें कई निजी स्कूल और छोटे कॉलेज भी शामिल होते हैं। इतने बड़े नेटवर्क में हर केंद्र पर समान सुरक्षा व्यवस्था लागू करना बेहद मुश्किल हो जाता है। कई जगह सीसीटीवी, जैमर और निगरानी सिस्टम पर्याप्त मजबूत नहीं होते। इसके मुकाबले JEE के केंद्र सीमित और तकनीकी रूप से एडवांस होते हैं। यहां निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था बेहतर तरीके से लागू की जा सकती है।
ज्यादा छात्र, ज्यादा दबाव
NEET में हर साल छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2026 में करीब 22 लाख उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए। इतनी बड़ी संख्या का प्रबंधन करना किसी भी एजेंसी के लिए बड़ी चुनौती है। हर छात्र की सख्त जांच, सेंटर मैनेजमेंट और निगरानी में थोड़ी भी ढिलाई बड़ी गड़बड़ी का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पेपर लीक माफिया इसी भारी दबाव और सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।
क्या अब बदलाव जरूरी है?
2024 और 2026 में सामने आए विवादों ने साफ संकेत दिया है कि NEET के मौजूदा सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक परीक्षा पूरी तरह डिजिटल नहीं होगी और इसे मल्टी-शिफ्ट सिस्टम में नहीं बदला जाएगा, तब तक पेपर लीक जैसी घटनाओं को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल रहेगा। सीबीआई जांच दोषियों तक पहुंच सकती है, लेकिन असली समाधान परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से मजबूत बनाना है।
छात्रों का भरोसा बहाल करना सबसे जरूरी
NEET देश के लाखों छात्रों के डॉक्टर बनने के सपने से जुड़ी परीक्षा है। ऐसे में बार-बार होने वाले विवाद छात्रों के मानसिक दबाव और भरोसे दोनों को प्रभावित करते हैं। अब जरूरत सिर्फ दोषियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें छात्रों को यह भरोसा हो कि उनकी मेहनत सुरक्षित है और परीक्षा पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हो रही है।
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