भारत में बनेगा ‘हैमर’ हथियार: फ्रांस के साथ जॉइंट वेंचर, सप्लाई और ताकत दोनों पर असर
भारत और फ्रांस के बीच ‘हैमर’ से जुड़ा जॉइंट वेंचर तय हुआ है। कौन सी भारतीय कंपनी साझेदार है, पार्टनरशिप मॉडल क्या है, और यह सिस्टम कितना असरदार माना जाता है—सब आसान हिंदी में।
भारत में बनेगा ‘हैमर’ हथियार: फ्रांस के साथ जॉइंट वेंचर, सप्लाई और ताकत दोनों पर असर
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आज की दुनिया में रक्षा सौदे सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रहे। अब असली लड़ाई “टेक्नोलॉजी”, “लोकल मैन्युफैक्चरिंग” और “तेज सप्लाई” की है। भारत भी इसी दिशा में पिछले कुछ वर्षों से तेजी से आगे बढ़ रहा है—कम से कम सोच के स्तर पर, और कई मामलों में जमीन पर भी।

इसी बीच भारत और फ्रांस के बीच एक ऐसा कदम सामने आया है, जिसकी चर्चा रक्षा गलियारों के साथ-साथ राजनीति में भी हो रही है। बात ‘हैमर’ नाम के एक स्मार्ट हथियार सिस्टम की है, जिसे अब भारत में बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।

डील में तय क्या हुआ?

रिपोर्ट के मुताबिक 17 फरवरी 2026 को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एक जॉइंट वेंचर पर मुहर लगाई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्रांस की कंपनी सैफ्रान और भारत की भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने 50:50 पार्टनरशिप में ‘हैमर’ बनाने का फैसला किया।
रिपोर्ट के अनुसार यह समझौता मोदी-मैक्रों की मुंबई मीटिंग का हिस्सा था, जहां राफेल जेट्स की बड़ी खरीद के साथ-साथ यह बात भी हुई।

यानी यह सिर्फ एक “प्रोडक्ट” का मामला नहीं है, बल्कि व्यापक रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है। जब दो देश रक्षा में साथ चलते हैं, तो उसके पीछे लंबे समय का भरोसा और योजनाएं होती हैं।

भारत में क्या बनेगा?

रिपोर्ट के मुताबिक अब ‘हैमर’ की गाइडेंस किट और प्रमुख कंपोनेंट्स भारत में बनाए जाएंगे, जिससे सप्लाई चेन मजबूत होगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस प्रोजेक्ट में लंबी रेंज वाले XLR वैरिएंट्स भी शामिल हो सकते हैं।

लोकल उत्पादन का एक फायदा यह होता है कि जरूरत के समय “कब आएगा?” वाला सवाल कम हो जाता है। दूसरा फायदा यह कि मेंटेनेंस और अपग्रेड में भी देश को ज्यादा नियंत्रण मिलता है।

हैमर’ सिस्टम है क्या?

रिपोर्ट में बताया गया है कि ‘हैमर’ का पूरा नाम Highly Agile Modular Munition Extended Range है और इसे एक लंबी दूरी तक मार करने वाला स्मार्ट बम/म्यूनिशन सिस्टम कहा गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक यह राफेल जेट से लॉन्च होने वाले प्रेसिजन-गाइडेड एयर-टू-ग्राउंड हथियार में इस्तेमाल होता है और इसकी रेंज 70 किलोमीटर तक बताई गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह हर मौसम में काम कर सकता है—दिन/रात और धुंध/बारिश जैसी स्थिति में भी।

आम भाषा में समझें तो इसका लक्ष्य “सटीक निशाना” है। यानी कम दूरी पर जाने की जरूरत कम, और टारगेट पर हिट की संभावना ज्यादा—ऐसा दावा किया जाता है।

गाइडेंस और वैरिएंट्स की बात

रिपोर्ट के अनुसार इसमें GPS, IR और लेजर गाइडेंस की बात कही गई है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह 250 किलो से 1,000 किलो तक के वैरिएंट्स में आती है और पहाड़ी इलाकों/मजबूत ठिकानों के लिए डिजाइन की गई है।

ऐसे हथियारों में “गाइडेंस” ही असली चीज होती है। क्योंकि आधुनिक युद्ध में अक्सर लक्ष्य छोटा होता है और आसपास नागरिक इलाका भी हो सकता है—तो सटीकता का दावा बहुत अहम माना जाता है।

ऑपरेशन सिंदूर’ का संदर्भ

रिपोर्ट में कहा गया है कि मई 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारतीय वायुसेना ने इसका इस्तेमाल पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर किया था।

जब किसी सिस्टम का इस्तेमाल वास्तविक ऑपरेशन में होने का दावा सामने आता है, तो उसकी चर्चा अपने आप बढ़ जाती है। हालांकि आम जनता के लिए यह भी जरूरी है कि ऐसे दावों को हमेशा आधिकारिक पुष्टियों और आगे आने वाली जानकारी के साथ देखकर समझा जाए।

रणनीतिक असर: संदेश और क्षमता

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोकल प्रोडक्शन से भारत को “फटाफट सप्लाई” मिलने की बात कही जा रही है और इसे सीमा पर स्ट्राइक क्षमता से जोड़ा गया है।

रणनीतिक रूप से देखें तो ऐसे कदम दो संदेश देते हैं—पहला, भारत अपनी क्षमताएं बढ़ा रहा है; दूसरा, भारत टेक्नोलॉजी और निर्माण में “लंबी दौड़” की तैयारी कर रहा है। फिर भी, किसी भी रक्षा कदम का अंतिम मकसद युद्ध नहीं, बल्कि युद्ध को रोकने की क्षमता बनाना होना चाहिए—यही संतुलित सोच सबसे जरूरी है।

आगे की असली कसौटी

इस तरह की डील की असली परीक्षा दो चीजों में होती है—क्या समय पर उत्पादन शुरू होता है, और क्या लागत/गुणवत्ता वाकई अपेक्षा के मुताबिक रहती है। घोषणाएं बड़ी होती हैं, लेकिन फैक्ट्री लाइन, सप्लाई और प्रशिक्षण—ये सब जमीन पर तय करते हैं कि लाभ कितना होगा।

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