ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
आज बच्चों की दुनिया स्कूल और खेल के साथ-साथ मोबाइल स्क्रीन में भी बसती है। कई घरों में यह रोज का अनुभव है—बच्चा खाना भी वीडियो देखते हुए खाता है, पढ़ाई के बीच भी स्क्रॉलिंग चलती है, और सोते समय भी फोन हाथ में होता है। यही वजह है कि “बच्चों का सोशल मीडिया” अब सिर्फ घर का मुद्दा नहीं, नीति का मुद्दा बन गया है।
भारत में भी इसी दिशा में एक बड़ी चर्चा शुरू हुई है—क्या बच्चों को सोशल मीडिया चलाने से रोका जाए? अगर रोका जाए तो किस उम्र तक? और अगर नियम बन भी गए, तो उन्हें लागू कैसे किया जाएगा?
सरकार की तैयारी क्या है?
रिपोर्ट
के मुताबिक केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सरकार
उम्र के आधार पर पाबंदियों को लेकर अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से बातचीत कर
रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के बाद भारत में
भी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर नियमों पर प्लानिंग शुरू हो गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के
लिए कोई नई गाइडलाइन या नीति लाई जा सकती है।
यह “प्लानिंग” वाला चरण बहुत अहम होता है, क्योंकि यहीं तय होता है कि नीति सिर्फ कागज पर रहेगी या सच में बच्चों की जिंदगी बेहतर करेगी।
मुद्दा उठ ही क्यों रहा है?
रिपोर्ट
के अनुसार सरकार का मकसद बच्चों और नाबालिगों को ऑनलाइन दुनिया में सुरक्षित माहौल
देना है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चिंता गलत कंटेंट, साइबर
बुलिंग और ऑनलाइन लत जैसे असर को लेकर है।
यह बातें हर माता-पिता ने किसी न किसी रूप में महसूस की हैं। कभी बच्चा अजनबी अकाउंट से परेशान होता है, कभी गुस्से में रहता है क्योंकि गेम बंद करवा दिया गया, और कभी बिना वजह डर या बेचैनी दिखने लगती है। कई बार कारण सामने नहीं आता, लेकिन स्क्रीन टाइम बढ़ता रहता है।
दूसरे देशों का उदाहरण क्यों दिया जा रहा है?
रिपोर्ट
में कहा गया है कि ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों में नाबालिगों के लिए नियम
सख्त किए गए हैं और कंपनियों की जिम्मेदारी तय की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत भी इन्हीं अनुभवों को देखते हुए बच्चों के
लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को ज्यादा सुरक्षित बनाने के विकल्प तलाश रहा है।
यहां सीखने वाली बात यह है कि नियम सिर्फ बच्चों पर नहीं, प्लेटफॉर्म्स पर भी लागू होने चाहिए। क्योंकि अगर कंटेंट और एल्गोरिदम वही रहेंगे, तो सिर्फ उम्र लिख देने से समस्या हल नहीं होगी।
सबसे बड़ी चुनौती: उम्र कैसे जांचेंगे?
भारत में अगर उम्र आधारित रोक आती है, तो सबसे बड़ा सवाल होगा—उम्र वेरिफाई कैसे होगी? क्या हर बच्चे से आईडी मांगी जाएगी? अगर आईडी मांगी जाएगी तो डेटा प्राइवेसी कैसे सुरक्षित रहेगी? और अगर आईडी नहीं मांगी जाएगी, तो नियम का पालन कैसे होगा?
कई लोग यह भी कहेंगे कि बच्चे तो माता-पिता के फोन पर अकाउंट बना ही लेंगे। यानी कानून बनाना एक बात है, और घर में उसे लागू करना दूसरी बात। इसलिए नीति बनाते समय परिवारों की वास्तविक स्थिति को समझना जरूरी होगा।
स्कूल, पैरेंट्स और प्लेटफॉर्म—तीनों की भूमिका
केवल सरकार के नियम से काम पूरा नहीं होगा। स्कूलों को डिजिटल आदतों पर बच्चों से बातचीत करनी होगी—डराने की भाषा में नहीं, समझाने की भाषा में। माता-पिता को भी “पूरी तरह फोन छीन लो” के बजाय “समय तय करो और साथ बैठकर सीखो” वाला तरीका अपनाना होगा।
और प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है—ऐसे फीचर बनाने की जो बच्चों को सुरक्षित रखें। जैसे मजबूत रिपोर्टिंग सिस्टम, संदिग्ध मैसेज पर चेतावनी, और डिफॉल्ट प्राइवेसी सेटिंग्स।
क्या सोशल मीडिया पूरी तरह बुरा है?
नहीं। सोशल मीडिया से सीखने, क्रिएटिविटी, और टैलेंट दिखाने के मौके भी मिलते हैं। कई बच्चे ड्रॉइंग, कोडिंग, भाषा सीखना और जनरल नॉलेज यहीं से लेते हैं। समस्या तब होती है जब कंटेंट का चुनाव बच्चा नहीं, एल्गोरिदम करने लगता है—और बच्चा बिना रुके देखता चला जाता है।
आगे क्या उम्मीद करें?
रिपोर्ट
के मुताबिक अभी प्लेटफॉर्म्स के साथ बातचीत चल रही है और सभी पक्षों की राय ली जा
रही है।
यानी नीति का अंतिम रूप क्या होगा, यह अभी तय
नहीं है।
लेकिन इतना साफ है कि भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा अब एक बड़ा पब्लिक मुद्दा बन चुका है। अगर नियम आएं तो उनका मकसद “पाबंदी” से ज्यादा “सुरक्षा और संतुलन” होना चाहिए—ताकि बच्चे इंटरनेट की अच्छी चीजें सीखें, और खराब असर से बचें।
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