ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
राजनीति में कैमरा बहुत कुछ दिखा देता है—भीड़, नारे, हाथ मिलाना, सेल्फी, और मंच की चमक। लेकिन वोट कैमरे से नहीं, ईवीएम से मिलता है। इसी बात को लेकर प्रशांत किशोर का एक वीडियो वायरल हो गया है, जिसमें वे कार्यकर्ताओं से बातचीत करते हुए कहते दिख रहे हैं कि जितने लोग उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं, उतना वोट भी नहीं मिला।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले बड़े दावे किए थे, लेकिन नतीजे के बाद उनकी पार्टी “जीरो” पर रह गई। अब वे हार का मंथन कर रहे हैं और अलग-अलग जिलों में जाकर कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं।
वायरल वीडियो में उन्होंने क्या कहा?
रिपोर्ट में बताया गया कि वीडियो में वे कार्यकर्ताओं से बात करते नजर आते हैं और कहते हैं—किसके पास प्रमाण है कि कौन ईमानदारी से काम कर रहा है, और जितने लोग उनके साथ फोटो खींचते हैं उतना वोट उन्हें नहीं मिला। उन्होंने यह भी कहा कि “हम ही किए हैं” जैसी बातों का कोई मतलब नहीं है। रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि वायरल वीडियो कहां का है, यह स्पष्ट नहीं हो सका।
इस वीडियो का “टोन” सीधा है—वे यह कहना चाहते दिखते हैं कि पार्टी के अंदर सिर्फ दावा करने से काम नहीं चलता, और जमीनी काम का सही आकलन जरूरी है। राजनीति में अक्सर यही होता है कि लोग मंच पर बड़ी बातें कर लेते हैं, लेकिन बूथ पर काम कमजोर रह जाता है।
बेगूसराय में क्या बोले?
रिपोर्ट के मुताबिक 17 फरवरी 2026 को वे बेगूसराय पहुंचे और बिहार में शराबबंदी व बढ़ते अपराध को लेकर एनडीए सरकार पर हमला बोला। उन्होंने जनता को भी सुनाया कि अगर शराबबंदी से महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है तो इसे पूरे देश में लागू करना चाहिए।
यह बयान एक तरह से “चैलेंज” जैसा है। वे सरकार से कह रहे हैं—अगर नीति इतनी सफल है, तो फिर उसे सिर्फ बिहार तक क्यों रखा गया? हालांकि शराबबंदी पर बिहार में पहले से ही समाज के अलग-अलग हिस्सों में अलग राय रही है।
“एनडीए को चुनोगे तो एजेंडा वही चलेगा”
रिपोर्ट के अनुसार प्रशांत किशोर ने कहा कि जन सुराज ने तीन साल तक रणनीति बनाकर काम किया और जनता ने करीब 18 लाख वोट दिए। उन्होंने यह भी कहा कि जनता ने उन्हें सेवा के लिए चुना है, बिहार छोड़कर जाने के लिए नहीं, इसलिए वे जनता के आदेश का पालन कर रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि उन्होंने कहा—जो बोओगे वही काटोगे; अगर आप एनडीए को चुनेंगे तो सरकार एनडीए के एजेंडे पर ही चलेगी। यह लाइन चुनाव के बाद की राजनीति में अक्सर सुनाई देती है, लेकिन यहां वे इसे “हार के सबक” की तरह भी रख रहे हैं—मतलब जनता ने जैसा चुना, वैसा ही शासन मिलेगा।
एक और मुद्दा: छात्रा की मौत का जिक्र
रिपोर्ट में नीट छात्रा की मौत पर उनकी टिप्पणी भी दर्ज है, जिसमें उन्होंने कहा कि पुलिस ने पहले इसे आत्महत्या करार दिया और हत्या मानने से इनकार किया। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि जब वे पीड़िता के परिवार से मिले तब जाकर एसआईटी बनी और दो पुलिस अधिकारी सस्पेंड हुए।
यह हिस्सा राजनीति से ज्यादा प्रशासन और जवाबदेही से जुड़ता है। विपक्ष अक्सर ऐसे मामलों को उठाकर सिस्टम की कमियां सामने लाने की कोशिश करता है।
प्रशांत किशोर के सामने अब असली चुनौती क्या है?
वायरल वीडियो की एक बात बहुत सीधी है—फोटो और भीड़ की चमक असली सपोर्ट का पैमाना नहीं है। अगर पार्टी को आगे बढ़ना है, तो उसे “लोग मिलते हैं” से आगे “लोग वोट देते हैं” तक की यात्रा करनी होगी। यह यात्रा संगठन, स्थानीय नेतृत्व, और लगातार मैदान में मौजूदगी से बनती है—सिर्फ भाषण से नहीं।
अब देखना यह होगा कि वे इस हार को “ब्रेक” बनाते हैं या “री-स्टार्ट”। राजनीति में कई नेता हार के बाद खत्म हो जाते हैं, और कई हार के बाद ही असली तैयारी शुरू करते हैं।
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