ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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केंद्र सरकार ने हाल ही में ‘वंदे मातरम्’ गीत को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। इसके अनुसार अब राष्ट्रगान और वंदे मातरम् दोनों गाने अनिवार्य होंगे, और इसे निर्धारित समय सीमा यानी तीन मिनट दस सेकेंड में पूरा करना होगा। पहले वंदे मातरम् गाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान। इस दौरान लोगों को सावधान मुद्रा में खड़ा होना होगा, जैसा कि राष्ट्रगान के दौरान किया जाता है। इस फैसले के बाद राजनीति में प्रतिक्रिया भी तेज़ हो गई है। समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद और नेता एसटी हसन ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
एसटी हसन का बड़ा बयान
एसटी हसन ने कहा कि हमारा देश अनेकता में एकता का देश है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने कहा कि सरकार इस मुद्दे को केवल कंट्रोवर्सी और वोट बैंक के लिए उठा रही है। उनका कहना था कि कुछ लोग वंदे मातरम् को इबादत या पूजा मानते हैं, खासकर कुछ मुसलमान, जिनके लिए यह उनके धर्म के अनुसार स्वीकार्य नहीं है।
उन्होंने कहा, “हमारे देश में सिख, ईसाई, मुसलमान और नास्तिक सभी रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा है कि किसी को किसी काम या गीत के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।” उनका तर्क था कि वंदे मातरम् गाने से महंगाई कम नहीं होगी, नौकरियां नहीं मिलेंगी, या इंडस्ट्री पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
राष्ट्रीय एकता और चुनावी राजनीति पर प्रभाव
एसटी हसन ने चेतावनी दी कि इस गाइडलाइन से नेशनल इंटीग्रिटी और राष्ट्रीय एकता को नुकसान हो सकता है। उनके अनुसार, सरकार हमेशा कंट्रोवर्सी के जरिए ही जीतती है, और इस बार नया मुद्दा इस तरह तैयार किया गया है ताकि हिंदू-मुसलमान मतदाता फिर से पोलराइज हों।
उन्होंने कहा कि किसी को अपने विचार के खिलाफ कठिनाई या मजबूरी में कोई गीत गाने को नहीं कहा जाना चाहिए। यदि कोई मुसलमान किसी तरह के दबाव में जय श्री राम कहने को मजबूर किया जाता है, तो कोर्ट उस पर कार्रवाई करती है। इसी तरह, वंदे मातरम् को लेकर भी लोगों की च्वाइस का सम्मान होना चाहिए।
नई गाइडलाइन का विवरण
केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार, अब स्कूल, कॉलेज और सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् और राष्ट्रगान दोनों अनिवार्य रूप से गाए जाएंगे।
सरकार का उद्देश्य देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ाना बताया गया है, लेकिन इसके सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभाव पर विवाद भी शुरू हो गया है।
एसटी हसन ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी को अनिवार्य रूप से गीत गाने पर मजबूर करना सही नहीं है। उनका कहना है कि देश की विविधता और एकता को ध्यान में रखते हुए ऐसे निर्णय लेने चाहिए। इस मुद्दे ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को भी तेज कर दिया है। केंद्र सरकार की यह नई गाइडलाइन देश में एकता और राष्ट्रीयता के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बन गई है।
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