ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों इतिहास का एक नाम फिर से सुर्खियों में है—टीपू सुल्तान। विवाद की शुरुआत मालेगांव महानगरपालिका के डिप्टी मेयर कार्यालय में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाए जाने से हुई। तस्वीर लगते ही राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई और मामला राज्यव्यापी बहस का विषय बन गया। बाद में तस्वीर हटा दी गई, लेकिन विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है।
शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ ने इस मुद्दे पर संपादकीय लिखते हुए बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस को भी घेरा है। संपादकीय में कहा गया कि औरंगजेब और अफजल खान की तरह मैसूर के टीपू सुल्तान को भी बार-बार कब्र से बाहर निकाला जा रहा है, जिससे राजनीतिक माहौल गर्म होता है।
मालेगांव से शुरू हुआ विवाद
मालेगांव के ‘शान-ए-हिंद’ हॉल में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हुआ। कुछ संगठनों ने इसे गलत बताते हुए आपत्ति जताई। विवाद बढ़ता देख तस्वीर हटा दी गई, लेकिन तब तक यह मुद्दा राजनीतिक रंग ले चुका था।
बीजेपी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी, जबकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल के एक बयान ने आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने टीपू सुल्तान की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज से कर दी, जिसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई।
‘सामना’ का संपादकीय: दोनों दलों पर निशाना
‘सामना’ के संपादकीय में कहा गया कि टीपू सुल्तान को लेकर बीजेपी ने हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश की। साथ ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल की उस टिप्पणी की भी आलोचना की गई, जिसमें उन्होंने टीपू सुल्तान की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज से की थी। लेख में इसे असंगत और अनुचित बताया गया।
संपादकीय में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रतिक्रिया का जिक्र करते हुए कहा गया कि उन्होंने कांग्रेस की आलोचना की, लेकिन सवाल यह है कि अगर टीपू सुल्तान को लेकर इतना आक्रोश है, तो पाकिस्तान के साथ होने वाले क्रिकेट मैचों पर चुप्पी क्यों है?
भारत-पाकिस्तान क्रिकेट पर उठाए सवाल
संपादकीय में एक बड़ा सवाल उठाया गया कि पाकिस्तान में टीपू सुल्तान को नायक माना जाता है और उसी पाकिस्तान के साथ भारत क्रिकेट मैच खेल रहा है। लेख में दावा किया गया कि भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के सूत्रधार गृहमंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह हैं। ऐसे में यदि टीपू के प्रति गुस्सा वास्तविक है, तो बीजेपी और उसके नेताओं को भारत-पाकिस्तान मैच की भी निंदा करनी चाहिए।
संपादकीय में यह भी पूछा गया कि इंडिया-पाकिस्तान क्रिकेट के खिलाफ कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं देखा जाता? अगर टीपू के नाम पर आक्रोश है, तो क्रिकेट के मुद्दे पर खामोशी क्यों?
हर्षवर्धन सपकाल पर केस
पुणे में हर्षवर्धन सपकाल के खिलाफ टीपू सुल्तान की प्रशंसा करने को लेकर मामला दर्ज किया गया है। हालांकि संपादकीय में सवाल उठाया गया कि पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने की प्रेरणा देने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती। इससे राजनीतिक बहस और गहरी हो गई है।
इतिहास बनाम वर्तमान राजनीति
संपादकीय में टीपू सुल्तान के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा गया कि वह मैसूर के राजा थे और उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध किया। कुछ इतिहासकार उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाला पहला स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं। वहीं दूसरी ओर, उन पर हिंदुओं के जबरन धर्म परिवर्तन और अत्याचार के आरोप भी लगते रहे हैं, जो विवाद का कारण बनते हैं।
लेख में यह भी स्पष्ट किया गया कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज की स्थापना शून्य से की थी और उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उनके योगदान को अद्वितीय बताया गया।
बीजेपी की मंशा पर सवाल
संपादकीय में दावा किया गया कि बीजेपी के कुछ नेता मुंबई की सड़कों का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखने की बात कर चुके हैं। ऐसे में सवाल उठाया गया कि जब इतिहास में टीपू सुल्तान एक विवादित व्यक्तित्व हैं, तो आज के राजनीतिक दल उनकी विरासत को लेकर अलग-अलग रुख क्यों अपनाते हैं?
लेख में कहा गया कि टीपू सुल्तान अब इतिहास का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीतिक दल वर्तमान मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए उन्हें बार-बार चर्चा में लाते हैं। बीजेपी से यह भी पूछा गया कि वर्तमान में वह राज्य और देश के विकास के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है।
बढ़ती राजनीतिक गर्मी
टीपू सुल्तान का नाम महाराष्ट्र की राजनीति में नया नहीं है, लेकिन हर बार यह मुद्दा भावनाओं और इतिहास की अलग-अलग व्याख्याओं के साथ सामने आता है। मालेगांव की एक तस्वीर से शुरू हुआ विवाद अब राज्य की बड़ी राजनीतिक बहस बन चुका है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर इसका असर राज्य की राजनीति और सामाजिक माहौल पर भी पड़ता है। फिलहाल, टीपू सुल्तान का नाम एक बार फिर इतिहास से निकलकर वर्तमान की राजनीति के केंद्र में आ गया है।
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