ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
रांची एयर एम्बुलेंस हादसा सिर्फ एक विमान दुर्घटना नहीं रहा—यह कई परिवारों के लिए एक साथ टूटने वाला सपनों का ढांचा बन गया। चतरा जिले के सिमरिया के जंगलों में विमान गिरा और उसके मलबे के नीचे 7 लोगों की जिंदगी खत्म हो गई। जिन घरों में फोन बजा, जिनके दरवाजे पर खबर पहुंची, वहां वक्त जैसे थम गया। दुख यह भी है कि इस यात्रा के पीछे “इलाज बचाने” की उम्मीद थी, लेकिन रास्ता ही मौत का रास्ता बन गया।
डॉक्टर की पढ़ाई भी कर्ज से, जिंदगी भी ड्यूटी पर खत्म
इस हादसे में डॉक्टर विकास कुमार गुप्ता की मौत भी हुई। उनके पिता ने बताया कि बेटे को डॉक्टर बनाने के लिए जमीन तक बेचनी पड़ी, कर्ज लेना पड़ा, और सालों तक एक ही सपना था कि पढ़ाई पूरी हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा। डॉक्टर ने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की, नौकरी लगी, घर बस रहा था, लेकिन एक ड्यूटी वाले दिन सब खत्म हो गया। उनके 7 साल के बेटे के लिए यह जीवन भर का खालीपन बन जाएगा।
मरीज की कहानी: आग, महंगा इलाज और एयर एम्बुलेंस
विमान में गंभीर रूप से झुलसे मरीज संजय कुमार भी थे, जो छोटा-सा होटल चलाते थे। होटल में शॉर्ट सर्किट से आग लगी और वह बुरी तरह झुलस गए। पहले स्थानीय अस्पताल, फिर बेहतर इलाज की जरूरत—और फिर दिल्ली ले जाने का फैसला। सड़क से जाना जोखिम था, इसलिए एयर एम्बुलेंस चुनी गई। लेकिन एयर एम्बुलेंस का किराया 7.5 से 8 लाख के आसपास पड़ा, जो परिवार के लिए बहुत बड़ी रकम थी। मजबूरी में रिश्तेदारों से उधार और ब्याज पर पैसे जुटाए गए। उन्हें लगा था कि जान बच जाएगी तो सब चुका देंगे।
एक 17 साल का लड़का भी साथ चला
इस सफर में 17 साल का ध्रुव कुमार भी था। वह पढ़ाई कर रहा था और आगे करियर के सपने देख रहा था। लेकिन मामा की हालत देखकर वह उनकी देखभाल में लग गया और साथ चल पड़ा। कभी-कभी परिवार में बच्चे भी जल्दी बड़े हो जाते हैं—जिम्मेदारी उन्हें वक्त से पहले समझ में आ जाती है। दुर्भाग्य यह है कि इस हादसे ने उस उम्र में ही जिंदगी छीन ली।
उड़ान, मौसम और ATC संपर्क टूटना
विमान शाम करीब 7:11 बजे उड़ान भरता है। थोड़ी देर बाद मौसम खराब होता है और रूट बदलने की कोशिश में 23 मिनट बाद ATC से संपर्क टूट जाता है। फिर वह जंगल में क्रैश हो जाता है। दुर्घटना इतनी भयानक थी कि किसी को बचने का मौका नहीं मिला। रेस्क्यू टीम को मलबे तक पहुंचने के लिए 4 किलोमीटर पैदल जाना पड़ा, और शवों को कंधों पर उठाकर बाहर लाना पड़ा।
इस हादसे का असली दर्द
कई परिवार पहले से कर्ज में थे—किसी की पढ़ाई कर्ज से, किसी का इलाज कर्ज से, और फिर एयर एम्बुलेंस का किराया भी कर्ज से। इस हादसे ने सिर्फ जानें नहीं लीं, उन घरों की आर्थिक रीढ़ भी तोड़ दी। अब सवाल यह है कि ऐसे मामलों में सिस्टम पीड़ित परिवारों के साथ कैसे खड़ा होगा, और एयर एम्बुलेंस जैसी सेवा की सुरक्षा व पारदर्शिता कैसे मजबूत होगी।
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