ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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क्रिकेट की दुनिया में जब शानदार कवर ड्राइव, दमदार शॉट्स और क्लासिक बल्लेबाजी की बात होती है, तो सबसे पहले विराट कोहली का नाम सामने आता है। विराट कोहली की बल्लेबाजी जितनी खास है, उतना ही खास उनका क्रिकेट बैट भी होता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस बैट से विराट मैदान पर बड़े-बड़े शॉट लगाते हैं, उसे तैयार होने में कई साल लग जाते हैं। एक प्रीमियम क्रिकेट बैट केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं होता। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, सही मौसम, खास पेड़, आधुनिक मशीनें और अनुभवी कारीगरों की कला छिपी होती है।
कहां बनता है विराट कोहली का बैट?
दुनिया के ज्यादातर प्रीमियम क्रिकेट बैट इंग्लैंड में उगने वाले इंग्लिश विलो पेड़ों से बनाए जाते हैं। यह लकड़ी हल्की होने के साथ-साथ काफी मजबूत भी होती है। यही वजह है कि बल्लेबाजों को इससे बेहतरीन पिंग और शानदार शॉट्स खेलने में मदद मिलती है। हालांकि भारत के कश्मीर में भी विलो पेड़ पाए जाते हैं, लेकिन इंग्लिश विलो की गुणवत्ता को दुनिया में सबसे बेहतर माना जाता है।
एक बैट बनने में लग जाते हैं 20 साल
विराट कोहली जैसे खिलाड़ियों के लिए इस्तेमाल होने वाला प्रीमियम बैट तैयार होने में करीब 15 से 20 साल तक का समय लग जाता है। सबसे पहले विलो पेड़ों की शाखाओं को जमीन में लगाकर नए पेड़ तैयार किए जाते हैं। शुरुआती 8 से 10 साल तक इन पेड़ों की साइड ब्रांचेज लगातार काटी जाती हैं, ताकि लकड़ी मजबूत बनी रहे। जब पेड़ पूरी तरह तैयार हो जाता है और उसका घेरा लगभग 1.4 मीटर तक पहुंच जाता है, तब उसे काटा जाता है।
एक पेड़ से सिर्फ 40 बैट बनते हैं
पेड़ काटने के बाद उसकी लकड़ी को बड़े-बड़े हिस्सों में बांटा जाता है। फिर इन हिस्सों को “क्लेफ्ट्स” में बदला जाता है। यही क्लेफ्ट्स आगे चलकर क्रिकेट बैट बनते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन्हें आरी से नहीं काटा जाता, बल्कि खास वेज की मदद से अलग किया जाता है ताकि लकड़ी के प्राकृतिक फाइबर कमजोर न हों। एक पूरे इंग्लिश विलो पेड़ से लगभग 40 क्लेफ्ट्स ही निकलते हैं, यानी एक पेड़ से सिर्फ 40 बैट बन पाते हैं।
लकड़ी को पहले सुखाया जाता है
क्लेफ्ट्स तैयार होने के बाद उन्हें तुरंत बैट में नहीं बदला जाता। सबसे पहले इन्हें करीब एक साल तक खुली हवा में सुखाया जाता है। इसके बाद लकड़ी को लगभग 10 हफ्तों तक लो-टेम्परेचर ड्राइंग चैंबर में रखा जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान लकड़ी की नमी को 10 से 12 प्रतिशत तक लाया जाता है। सही नमी होने से बैट ज्यादा मजबूत और टिकाऊ बनता है।
मेरठ पहुंचकर शुरू होता है असली काम
लकड़ी तैयार होने के बाद ये क्लेफ्ट्स करीब 11 हजार किलोमीटर का सफर तय करके भारत के मेरठ शहर पहुंचते हैं। मेरठ को क्रिकेट बैट निर्माण का बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां SG और SS जैसी कंपनियां दुनिया के बेहतरीन इंग्लिश विलो बैट तैयार करती हैं।
2 टन दबाव से होती है प्रेसिंग
मेरठ पहुंचने के बाद क्लेफ्ट्स को भारी मशीनों से प्रेस किया जाता है। लगभग 2 टन प्रति स्क्वायर इंच के दबाव से लकड़ी को दबाया जाता है ताकि वह मजबूत बन सके। यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है। ज्यादा दबाव देने से बैट की पिंग खराब हो सकती है, जबकि कम दबाव देने पर बैट कमजोर रह जाता है।
हाथों से दी जाती है फाइनल शेप
मशीनों से शुरुआती आकार देने के बाद एक अनुभवी कारीगर करीब तीन घंटे तक हाथों से बैट को अंतिम रूप देता है। बैट का वजन, बैलेंस, किनारों की मोटाई और ग्रिप जैसी चीजों पर खास ध्यान दिया जाता है।
हर खिलाड़ी की जरूरत अलग होती है। उदाहरण के लिए:
• Sachin Tendulkar भारी बैट पसंद करते थे
• Hardik Pandya ज्यादा कर्व वाला बैट इस्तेमाल करते हैं
• Suryakumar Yadav के बैट में खास रेड शेड देखा जाता है
• विराट कोहली संतुलित वजन और शानदार पिंग वाले बैट पसंद करते हैं
हैंडल अलग लकड़ी से बनाया जाता है
क्रिकेट बैट का हैंडल इंग्लिश विलो से नहीं बनाया जाता। इसके लिए मलेशिया से आने वाली खास “मनो केन” लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। यह लकड़ी काफी लचीली होती है, जिससे बल्लेबाज को बेहतर कंट्रोल और कम झटका महसूस होता है।
आखिर में होता है हैमर टेस्ट
बैट तैयार होने के बाद उसका अंतिम टेस्ट किया जाता है। कारीगर बैट पर हल्के हथौड़े से चोट मारकर उसकी आवाज सुनते हैं। अनुभवी कारीगर सिर्फ आवाज सुनकर समझ जाते हैं कि बैट सही बना है या नहीं। अगर आवाज सही न लगे तो बैट को दोबारा सुधारा जाता है। यही वजह है कि विराट कोहली जैसे खिलाड़ियों का बैट सिर्फ एक स्पोर्ट्स इक्विपमेंट नहीं, बल्कि कई सालों की मेहनत और कला का बेहतरीन नमूना होता है।
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