ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
नोएडा के सेक्टर‑150 में 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत सिर्फ एक दुखद मौत नहीं थी, बल्कि एक सिस्टम और प्रशासन की कमजोरी का प्रतीक बन गई। एक ऐसी गलती जिसने केवल एक इंसान की जान ही नहीं ली, बल्कि कई सवालों के जवाब भी मांग लिए। युवराज की कार एक पानी भरे गड्ढे में डूब गई और उन्हें बचाने के लिए जब प्रशासन और बचाव दल मौके पर पहुंचे, तो वह पहले ही पानी में डूब चुके थे। इसके बाद परिवार, जनता और विशेषज्ञों ने प्रशासन की चुप्पी और देरी पर कड़ी आलोचना शुरू कर दी।
क्या हुआ था घटना के दौरान?
16‑17 जनवरी की रात जब कोहरे और अंधेरा था, तब युवराज की कार अचानक गहरे गड्ढे में गिर गई। गड्ढा लंबे समय से पानी से भरा हुआ था और प्रशासन ने उस पर कोई उचित सुरक्षा बाड़, चेतावनी बोर्ड या रोशनी नहीं लगाई थी। युवराज लगभग दो घंटे तक अपनी कार की छत पर चढ़कर मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन बचाव दल समय पर प्रभावी सहायता नहीं पहुंचा सका।
प्रशासन की चुप्पी: जिम्मेदार कौन?
इस मामले में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारियों का नाम है, जिनकी चुप्पी “चीखते” महसूस हो रही है:
डीएम मेधा रूपम
जिले की डिजास्टर मैनेजमेंट की जिम्मेदारी रखते हुए, वह हादसे के तुरंत बाद सक्रिय नहीं दिखीं और मौके पर देरी से पहुँचीं।
नोएडा अथॉरिटी के सीईओ — लोकेश एम.
शहर में गड्ढों और ब्लैक स्पॉट्स को ठीक करने की जिम्मेदारी इनकी थी, लेकिन इस मामले में उन्होंने कोई आधिकारिक बयान या सक्रिय कदम नहीं उठाया।
पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह और SHO सर्वेश सिंह
तैनाती के बावजूद पार्टियों में तालमेल नहीं दिखा, और बचाव में देरी पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
SDRF और फायर डिपार्टमेंट
रेस्क्यू दलों ने मुश्किल हालात का हवाला दिया, लेकिन विशेषज्ञों और चश्मदीदों का कहना है कि उपकरण और तैयारी का अभाव था।
रेस्क्यू में देरी: क्या बार‑बार बचाया जा सकता था?
चश्मदीदों ने प्रशासन की देरी पर सवाल उठाए हैं। एक चश्मदीद ने बताया कि पुलिस और फायर ब्रिगेड मौके पर आई तो वैसे ही खड़ी रही, जबकि अपने दोस्तों को बुलाने पर शायद युवराज को बचाया जा सकता था।
एक और रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF और NDRF तक पहुँचने में काफी समय लगा। इस देरी ने युवराज को बचाने का मौका और कम कर दिया।
क्या योजना पहले से थी? चेतावनी मिली थी लेकिन अनसुनी?
एक आर्थिक टाइम्स रिपोर्ट के अनुसार, इस गड्ढे और आसपास के पानी भरने की समस्या के बारे में 2015 से लापरवाही की चेतावनी दी जा चुकी थी। विभागों ने इसे फाइलों में दबी रहने दिया और कोई असरदार क़दम नहीं उठाया।
यह दिखाता है कि पूर्वसूचना के बावजूद प्रशासन ने सुरक्षा कदम नहीं उठाए, जो अंततः युवराज के लिए घातक साबित हुआ।
पुलिस और प्रशासन की सुस्त प्रतिक्रिया
लोकल प्रशासन की प्रतिक्रिया को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं:
मौके पर पुलिस और SDRF कब पहुँचे?
पुलिस के अनुसार, SDRF को जल्दी बुलाया गया, लेकिन विजिबिलिटी कम थी और उपकरण सही नहीं थे।
एनडीआरएफ कब आया?
स्थानीय बचाव दलों के बाद NDRF टीम को बुलाया गया, लेकिन तब तक युवराज की हालत गंभीर हो चुकी थी।
क्या स्थानीय पुलिस ने उचित प्राथमिक बचाव कदम उठाए?
चश्मदीदों का कहना है कि बिना तैयारी के कई देर तक केवल नजरबंदी की गई और समय पर NDRF टीम नहीं बुलाई गई।
खुद विशेषज्ञों और जनता की प्रतिक्रिया
जनता और विशेषज्ञों ने प्रशासन को निशाने पर लिया है। अभिनेता सौरभ राज जैन और अभिनव शुक्ला जैसे सेलेब्स ने भी नोएडा अथॉरिटी की निराशाजनक प्रतिक्रिया पर भड़ास निकाली है, कहा कि प्रशासन को शर्म आनी चाहिए।
कई लोगों ने यह भी कहा कि यह घटना सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है — जब एक युवक मदद के लिए चिल्ला रहा हो और अधिकारी उसे बचाने में असमर्थ दिखें।
विशेष जांच टीम (SIT) और कार्रवाई
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस घटना की जांच के लिए SIT (विशेष जांच टीम) का गठन किया है। दोषियों, बिल्डर्स और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट करने के लिए यह टीम पाँच दिनों में रिपोर्ट सौंपेगी। मृतक के पिता ने इस कदम पर संतोष जताया है।
नगर के CEO को हटाया गया और कुछ इंजीनियरों को सस्पेंड किया गया, लेकिन जनता अभी भी चाहती है कि जवाबदेही पूरी तरह तय हो और प्रशासन में सुधार आए।
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