ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
देश में जनसंख्या, धर्म और समाज को लेकर बयान आते रहते हैं, लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो सीधे बहस का केंद्र बन जाती हैं। ऐसा ही एक बयान बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का सामने आया है। पुष्कर में कथा के दौरान उन्होंने हिंदुओं की घटती आबादी पर चिंता जताई और कहा कि हिंदू समाज को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए। उनका यह बयान सोशल मीडिया से लेकर आम बातचीत तक में छा गया।
“घटते हिंदू” वाली चिंता
धीरेंद्र शास्त्री का कहना था कि यह सिर्फ भारत का नहीं, बल्कि वैश्विक विषय है। उन्होंने दावा किया कि हिंदू आबादी कम हो रही है और इससे भविष्य में समाज पर असर पड़ सकता है। इस बात को उन्होंने देश की स्थिति से जोड़ते हुए कहा कि अगर संतुलन बिगड़ा, तो आगे परेशानियां बढ़ सकती हैं। इस तरह की बात सुनने वालों में कुछ लोग सहमत दिखे, तो कुछ ने इसे बेवजह डर फैलाने वाला बताया।
“शादी के बाद मैं भी…” वाली लाइन
उनके बयान का दूसरा हिस्सा ज्यादा चर्चा में रहा, जब उन्होंने कहा कि उनकी अभी शादी नहीं हुई है, इसलिए लोग उनसे भी सवाल करेंगे कि उनका योगदान क्या है। उन्होंने आगे कहा कि जब शादी होगी, तो वे भी हिंदुओं की आबादी बढ़ाने में योगदान देंगे। यह लाइन लोगों को अलग-अलग तरह से लगी—कुछ ने इसे मजाकिया अंदाज कहा, कुछ ने इसे गंभीर मुद्दे पर हल्का बोलना माना।
घर वापसी और धर्म की बातें
बयान में उन्होंने “घर वापसी” पर भी अपनी राय दी और कहा कि कई लोगों के पूर्वज हिंदू थे। साथ ही उन्होंने हिंदुओं से यह भी अपील की कि अपनी श्रद्धा अपने धर्म में रखें और दूसरे धर्म की जगहों पर जाने को लेकर सोचें। इन बातों पर भी लोगों की राय बंटी हुई दिखी—कुछ ने समर्थन किया, तो कुछ ने इसे धार्मिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देखा।
क्यों बढ़ जाती है ऐसी बातों पर बहस?
असल में जनसंख्या जैसे मुद्दे पर जब धर्म का एंगल जुड़ता है, तो मामला सिर्फ परिवार नियोजन का नहीं रहता। यह पहचान, राजनीति और समाज की दिशा से जुड़ जाता है। इसी वजह से ऐसे बयान एक हिस्से को उत्साहित करते हैं और दूसरे हिस्से को चिंतित या नाराज। आज के समय में छोटी-सी क्लिप भी वायरल होकर बड़ी बहस बना देती है।
आम लोगों के लिए क्या समझ?
चार बच्चे हों या तीन—यह फैसला हर परिवार की आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य की प्लानिंग से जुड़ा है। किसी भी बयान को सुनते समय यह समझना जरूरी है कि बच्चे सिर्फ संख्या नहीं, जिम्मेदारी भी हैं। समाज की असली जरूरत यह है कि जो बच्चे हों, उन्हें बेहतर शिक्षा, सुरक्षित माहौल और अच्छे अवसर मिलें। बहस जितनी तेज हो, लेकिन परिवार का फैसला सोच-समझकर ही होना चाहिए।
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