ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
दिल्ली के बवाना क्षेत्र में स्थित एक सरकारी स्कूल की हालत देखकर हर कोई दंग रह जाता है। 2020 में बनाए गए इस विद्यालय की इमारत अब इतनी खराब हो चुकी है कि शिक्षा मंत्री ने इसे ‘भ्रष्टाचार का स्मारक’ तक कहा है। यह विवाद सिर्फ इमारत की टूट-फूट का नहीं है, बल्कि इससे जुड़े बच्चों के भविष्य, प्रशासन की जवाबदेही और शिक्षा नीति की जांच जैसे सवाल खड़े कर रहा है।
स्कूल की हालत इतनी खराब कैसे हो गई?
शाहबाद डेयरी इलाके में स्थित इस लाल स्कूल का निर्माण सिर्फ कुछ साल पहले 2020 में हुआ था। लेकिन 2024 में ही इसे “असुरक्षित” करार देना पड़ा। अधिकारियों ने बताया कि निर्माण के दौरान उपयोग की गई सामग्री काफी घटिया थी, जिससे इमारत इतनी जल्दी ही टूट-फूट का शिकार हो गई।
निरीक्षण के दौरान कई दीवारों से प्लास्टर गिरा हुआ, फर्श उखड़ा हुआ और कक्षाओं की खिड़कियाँ टूटी-फूटी हालत में पाई गईं। बच्चों के लिए यह स्थिति सीधे जिंदगी और सुरक्षा पर खतरा बन चुकी है।
बच्चों के लिए रोज़मर्रा की समस्या
स्कूल की हालत खराब होने से लगभग 5000 बच्चों को ऐसे समय में अपने विद्यालय से रोहिणी के दूसरे स्कूलों में भेजा गया था, जब उनकी पढ़ाई सबसे ज़्यादा महत्व रखती थी। इन बच्चों को रोज़ाना 2.5 से 3 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ा है।
अभिभावकों की चिंता यह है कि छोटे-छोटे बच्चों को इतनी दूरी पैदल तय करानी सुरक्षित नहीं है, खासकर जब मौसम कठिन हो। इस समस्या के कारण बच्चों की पढ़ाई में गिरावट और स्वास्थ्य पर असर भी देखा गया है।
शिक्षा मंत्री ने क्या कहा?
दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने इस स्कूल की स्थिती को देखकर बहुत सीधे शब्दों में कहा कि यह ‘भ्रष्टाचार का स्मारक’ बन चुका है। उनके अनुसार, इतने कम समय में इमारत की इतनी खराब हालत यह दिखाती है कि निर्माण और गुणवत्ता में कोई गंभीर कमी या लापरवाही हुई है।
उन्होंने यह भी पूछा कि आस-पास के पुराने घरों में पानी या मिट्टी की कोई समस्या नहीं है, फिर भी नई इमारत क्यों इतनी जल्दी ख़राब हो गई? यह सवाल इस बात की तरफ इशारा करता है कि बस प्रकृति की वजह से नहीं, बल्कि बनावट में कहीं कमी के कारण ऐसी स्थिति आई है।
जांच और सुधार के निर्देश
शिक्षा मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे इस मामले की गहन जांच करें और दोषियों की पहचान करके सख्त कार्रवाई करें। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि इस स्कूल को नई और मजबूत इमारत के रूप में फिर से बनाया जाएगा, ताकि बच्चों को एक सुरक्षित और आधुनिक पढ़ाई का माहौल मिल सके।
उनके निर्देशों के अनुसार, सरकारी जमीन का सही उपयोग किया जाएगा और वहाँ पर वॉकिंग ट्रैक, मल्टीपर्पज हॉल और हॉस्टल जैसे सुविधाएँ भी विकसित करने के लिए योजना तैयार की जाएगी।
राजनीतिक विवाद और प्रतिक्रिया
स्कूल की जर्जर हालत और मंत्री के कठोर शब्दों के बाद राजनीतिक जवाब भी आया। दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी ने कहा कि आरोपों के बजाय निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। उनका कहना है कि राजनीतिक बयानबाज़ी से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि सभी पहलुओं की जांच कर जिम्मेदारों की पहचान होनी चाहिए।
यह विवाद शिक्षा और भवन निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है, लेकिन राजनीतिक बयानबाज़ी इसे और भी गहरा बना देती है। जनता का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, चाहे उसके पीछे किसी भी तरफ की राजनीति क्यों न हो।
स्थानीय लोग क्या कहते हैं?
स्थानीय समाज, आरडब्ल्यूए और स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य भी इस मुद्दे को गंभीर मानते हैं। उनका कहना है कि इलाके में पानी या मिट्टी की कोई अनियमितता नहीं है जो इमारत को नुकसान पहुँचा सकती। वे मानते हैं कि यह निर्माण की गुणवत्ता की कमज़ोरी का परिणाम है, ना कि प्राकृतिक कारकों का।
बच्चों और अभिभावकों का कहना है कि उन्हें रोज़-रोज़ इतनी दूर स्कूल भेजना मुश्किल हो रहा है और इससे बच्चों के टाइम टेबल, पढाई और स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ा है। वे चाहते हैं कि जल्द से जल्द इस समस्या का समाधान हो और बच्चों को पास-पास सुरक्षित स्कूल मिले।
क्या यह अकेला मामला है?
दिल्ली में कई जगहों पर स्कूलों को लेकर विवाद या शिकायतें आती रही हैं — जैसे फीस बढ़ोतरी, भवन की स्थिति या पढ़ाई-संबंधी समस्याएँ आदि। इन मुद्दों पर सरकारी ऑडिट और निगरानी भी जरूरी देखी जाती है, लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में प्रभावी निगरानी कमज़ोर साबित होती है।
बवाना वाले इस उदाहरण से यह सामने आता है कि सिर्फ ‘वर्ल्ड क्लास स्कूल’ का शब्द कहना ही काफी नहीं है — निर्माण की गुणवत्ता, सामग्री और नियमित निरीक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
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