ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को 2020 के उत्तर‑पूर्वी दिल्ली दंगों (Northeast Delhi riots) से जुड़े मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन की नियमित जमानत याचिका को अस्वीकार कर दिया। इसके साथ ही दो अन्य आरोपियों सलीम मलिक और अथर खान की भी बेल याचिका खारिज कर दी गई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इन आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है और इसलिए उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती।
यह फैसला 2020 के दंगों की एक बड़ी साजिश मामले के सिलसिले में आया है, जिसमें दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया है कि आरोपितों ने दंगों को संगठित विध्वंस और हिंसा के लिए योजना बद्ध रूप से अंजाम दिया था। कोर्ट की इस ताज़ा सुनवाई में ये भी स्पष्ट किया गया कि पहले से ही याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था और अब उसकी पुनः समीक्षा संभव नहीं है।
पूरा मामला: 2020 के दंगे और FIR दर्ज
उत्तर‑पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी 2020 को शुरू हुए दंगों में 53 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। ये दंगे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़क उठे थे और कई इलाकों में हिंसा, आगजनी और पत्थरबाज़ी देखी गई थी।
दिल्ली पुलिस ने इन दंगों के सिलसिले में एक बड़ी साजिश के आरोप में कई लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। इसमें ताहिर हुसैन सहित कई आरोपियों को गंभीर आपराधिक साजिश और UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत नामजद किया गया है। ताहिर हुसैन ने मार्च 2020 में राउज एवेन्यू कोर्ट में सरेंडर किया था और बाद में कड़कड़डूमा कोर्ट में मामला चल रहा है।
कोर्ट ने क्यों खारिज की जमानत याचिका?
कोर्ट ने अपनी ताज़ा सुनवाई में स्पष्ट कहा है कि:
• पहले से ही प्रथम दृष्टया आरोपों के खिलाफ मामला बनता है और इसलिए जमानत देना उचित नहीं है।
• सुप्रीम कोर्ट ने पांच अन्य आरोपियों को पहले जमानत दी थी, लेकिन ताहिर हुसैन और अन्य के मामले अलग हैं और पहले भी उन्हें बेल नहीं दी गई थी।
• जमानत के लिए आवेदनों को पुनः समीक्षा के रूप में नहीं देखा जा सकता क्योंकि पहले से मामला गंभीर पाया गया है।
अदालत की यह दलील है कि जमानत एक कानूनी विकल्प है, लेकिन उसे तभी स्वीकार किया जाता है जब आरोपी के खिलाफ पहले से स्थापित तथ्य पर शक हो, जो इस मामले में नहीं दिखता।
अदालत में पुलिस ने क्या कहा?
दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया कि ताहिर हुसैन के खिलाफ पर्याप्त सबूत और प्रारंभिक तथ्य पेश किए गए हैं, जो दिखाते हैं कि वह दंगों के दौरान सक्रिय रूप से हिंसा और साजिश में शामिल थे। पुलिस का यह भी कहना रहा कि इस मामले में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई और इसलिए उन्हें बेल नहीं मिलनी चाहिए।
कई गवाहों और साक्ष्यों का हवाला देते हुए पुलिस ने यह दावा किया कि दंगों का आयोजन और उसके फैलाव के पीछे यह आरोपी सक्रिय रूप से जुड़े थे, जिसके चलते कोर्ट ने बेल देने से इनकार कर दिया।
अन्य आरोपियों की स्थिति कैसे है?
हाल के समय में सुप्रीम कोर्ट ने इस ही मामले में पांच अन्य आरोपियों को बेल दी थी जिनके नाम हैं:
• शिफा‑उर‑रहमान
• गुलफिशा फातिमा
• सलीम खान
• मीरान हैदर
• शादाब अहमद
इन आरोपियों को जनवरी 2026 में उच्च न्यायालय द्वारा जमानत दी गयी थी, लेकिन ताहिर हुसैन और दो अन्य के मामले अलग न्यायिक विवेचना में हैं। कोर्ट ने यह भी बताया कि बेल दिए जाने का निर्णय सभी आरोपियों के मामले में समान नहीं लिया जा सकता, क्योंकि आरोप‑साक्ष्य का स्तर अलग‑अलग होता है।
अन्य कानूनी मामलों का भी है हिस्सा
ताहिर हुसैन पर IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या जैसे गंभीर आरोप भी हैं। इस मामले में भी दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही उनकी जमानत याचिका खारिज कर चुकी है, साथ ही यह मामले अलग अदालतों में भी लंबित हैं।
इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के अधिकारी अंकित शर्मा को दंगों के दौरान भीड़ ने मार डाला था और आरोप है कि ताहिर हुसैन ने भीड़ को भड़काया था। इसके चलते उस मामले में भी हत्या का आरोप चल रहा है और याचिकाओं को न्यायालय द्वारा खारिज किया गया है।
इन दोनों मामलों का जुड़ाव उस बड़ी साजिश के कथित नेटवर्क से भी है, जो 2020 के दंगों में शामिल बताया जाता है। कोर्ट का मानना रहा है कि ऐसे मामले में बेल देना उचित नहीं है जब तक कि आरोप सिद्ध नहीं हो जाते।
जमानत न मिलने के प्रभाव
ताहिर हुसैन अभी भी न्यायिक हिरासत में हैं और बेल न मिलने के कारण वह फिलहाल जेल में ही रहेंगे। इससे न केवल उनका राजनीतिक करियर प्रभावित हुआ है, बल्कि उनके लिए आगे की कानूनी लड़ाई भी कठिन होती जा रही है। वहीं अन्य आरोपी जिनको पहले बेल मिली थी, वे अंतरिम तौर पर जेल से बाहर रहकर अपनी कानूनी तैयारी कर सकते हैं, लेकिन ताहिर हुसैन के मामले में ऐसा नहीं है।
भविष्य में क्या हो सकता है?
अब ताहिर हुसैन और अन्य आरोपियों को अपनी अगली कानूनी रणनीति तैयार करनी होगी। वे उच्च अदालत या सुप्रीम कोर्ट में अधिकारियों के फैसले को चुनौती दे सकते हैं। इस तरह के मामलों में अक्सर उच्च न्यायालयों की समीक्षा से फैसला बदलने के भी उदाहरण हैं, लेकिन उम्मीद तभी संभव है जब नए तथ्य या मजबूत तर्क पेश किए जाएं।
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