ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI) भारत की प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है और दिल्ली‑NCR क्षेत्र में शिक्षा‑अनुसंधान की मजबूत पहचान रखता है। लेकिन हाल ही में यहां एक गंभीर विवाद उभरकर सामने आया है, जिसने विश्वविद्यालय के माहौल और सामाजिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा कर दिया है। एक एसोसिएट प्रोफेसर पर अपने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के कर्मचारी के साथ जातिसूचक टिप्पणी और शारीरिक हिंसा का आरोप लगा है, जिसके बाद पुलिस में FIR दर्ज कर जांच शुरू हो गई है।
क्या हुआ घटना के दिन?
20 जनवरी 2026 को दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एक एसोसिएट प्रोफेसर के खिलाफ अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मामला दर्ज किया। यह FIR रामफूल मीणा नामक एक कर्मचारी की शिकायत पर दर्ज की गई, जिन्होंने आरोप लगाया कि प्रोफेसर ने उन्हें अपशब्द कहे और उनके साथ मारपीट की।
मीणा जामिया के पॉलिटेक्निक विभाग में अपर डिवीजन क्लर्क (UDC) पद पर कार्यरत हैं। उनका कहना है कि इस प्रोफेसर ने उनके चेहरे पर मुक्के मारे, जिससे उनके होंठ फट गए और आंख के नीचे सूजन भी आ गई। साथ ही आरोपों में यह भी शामिल है कि प्रोफेसर ने उन्हें जातिसूचक शब्दों का उपयोग करते हुए अपमानित किया, जैसे “तुम आदिवासी जंगली हो” और “मुसलमानों के संस्थान में रहकर शिकायत करने की हिम्मत कैसे की?” जैसे भद्दे बोल कहे।
FIR में क्या आरोप दर्ज हैं?
पुलिस ने प्रोफेसर के खिलाफ SC/ST Act की धारा 3(आई)(आर) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की उपयुक्त धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। FIR के अनुसार, घटना 13 जनवरी 2026 को हुई थी, जब कर्मचारी ने प्रोफेसर को अपनी डेस्क पर बुलाया और बातचीत के दौरान विवाद बढ़ता गया। पुलिस ने जांच शुरू कर दी है और बयान दर्ज किए जा रहे हैं।
विशेष रूप से पुलिस ने स्पष्ट किया है कि सोशल मीडिया पर वायरल धर्मांतरण से जुड़े आरोपों को सत्य नहीं माना गया है और इस मामले की जांच वही मुकदमा तय करेगा। पुलिस अधिकारी ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की सलाह भी दी है।
सोशल मीडिया और मीडिया में प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और पोस्ट्स में प्रोफेसर के व्यवहार को लेकर कई दावे किए जा रहे हैं, जिनमें धर्मांतरण के आरोप तक शामिल हैं। हालांकि पुलिस ने यह स्पष्ट किया है कि अड़ाई जा रही धार्मिक परिवर्तन (religious conversion) से जुड़ी खबरें तथ्यात्मक रूप से गलत हैं।
एक वायरल वीडियो के बारे में विश्वविद्यालय ने कहा है कि वह वीडियो में छेड़छाड़ की गई सामग्री देखने को मिल रही है और वास्तविक घटना से उसका कोई लेना‑देना नहीं है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक प्रवक्ता ने यह भी कहा है कि उनके पास ऐसे किसी भी मामले की औपचारिक शिकायत नहीं आई है।
जामिया विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया
जामिया की तरफ से कहा गया है कि उन्होंने अभी तक किसी लिखित शिकायत को अपने स्तर पर रिकॉर्ड नहीं किया है। यदि कोई कर्मचारी विश्वविद्यालय प्रशासन तक शिकायत लाता है, तो उसके आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। इस बीच वायरल वीडियो के बारे में कहा गया है कि वह असली घटना का नहीं बल्कि इंटरनेट पर एडिट किया हुआ वीडियो है।
विश्वविद्यालय के बयान से यह स्पष्टरूप से सामने आता है कि प्रशासन मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए आत्म‑जांच या किसी प्रकार की ऑन‑स्पॉट कार्रवाई की बात नहीं कह रहा है, बल्कि वह पुलिस जांच पर भरोसा जताता दिख रहा है।
किसान और कर्मचारी समुदाय की बातें
घटना के बाद मीडिया में महिला और पुरुष कर्मचारी, छात्र और सामाजिक समूहों की प्रतिक्रियाएँ भी सामने आई हैं। कुछ लोग इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि जैसी संस्था शिक्षा का प्रसार करती है, उसी में इस तरह की घटनाएँ कैसे हो सकती हैं? और क्या यह सिर्फ एक व्यक्तिगत घटना है या इससे कहीं बड़े सामाजिक मुद्दे का संकेत मिलता है?
अनुसूचित जाति/जनजाति के प्रति भेदभाव और हिंसा वो मुद्दा है जिसे भारत की सामाजिक संरचना में वर्षों से चुनौती माना जाता रहा है। ऐसे समय में विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में इस तरह के आरोप सुनने को मिलना कई लोगों के लिए चिंताजनक विषय है।
SC/ST Act का महत्व और प्रभाव
भारत में SC/ST Act का उद्देश्य उन समुदायों को सुरक्षा देना है जो अतीत में अत्याचार और भेदभाव के शिकार रहे हैं। यह कानून न सिर्फ किसी भी तरह की दुर्व्यवहार या निरादर के खिलाफ सख्त कार्रवाई को सुनिश्चित करता है, बल्कि यह संकेत देता है कि समाज के कमजोर वर्ग को न्यायिक सुरक्षा मिलेगी।
जब ऐसी गंभीर धाराएँ लागू होती हैं और कानून के तहत मामला दर्ज किया जाता है, तो जवाबदेही के साथ‑साथ जांच प्रक्रिया भी सुचारु रूप से चलती है। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि प्रोफेसर के खिलाफ लगाए गए आरोप कितने सच हैं और क्या उसके खिलाफ आगे आरोप सिद्ध किए जा सकते हैं।
अकादमिक माहौल और भविष्य की चिंताएँ
जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे उच्च शिक्षा संस्थान को अकादमिक स्वतंत्रता, पेशेवर व्यवहार और समान अधिकार सभी को सुरक्षित रखना होता है। अगर एक प्रोफेसर पर ऐसे आरोप लगे हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या सामाजिक या जातिगत पूर्वाग्रह अब शिक्षण संस्थानों तक पहुंच रही है? यह सोचने की बात है कि क्या केवल एक घटना है या कहीं कहीं संस्थागत संस्कृति में बदलाव की जरूरत है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों का सामना करते समय उच्च शिक्षा के संस्थानों को अपने नियम‑कायदों, आचार संहिता और नैतिक अपेक्षाओं को और स्पष्ट करना चाहिए, ताकि भविष्य में छात्रों, कर्मचारियों और शिक्षकों के बीच समान सम्मान और सुरक्षा बनी रहे।
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