ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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धर्मनगरी हरिद्वार में इन दिनों एक अनोखा विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है। यह विवाद किसी धार्मिक आयोजन या राजनीतिक मुद्दे को लेकर नहीं, बल्कि सड़क किनारे बिकने वाली "वेज बिरयानी" के नाम को लेकर शुरू हुआ है। साधु-संतों द्वारा चलाए गए एक अभियान के बाद यह मामला सुर्खियों में आ गया है, जिस पर अब मुस्लिम संघर्ष समिति ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है।
क्या है पूरा मामला?
हरिद्वार में अखंड परशुराम अखाड़े के नेतृत्व में साधु-संतों ने शहर के विभिन्न इलाकों में अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने सड़क किनारे लगी रेहड़ियों और ठेलियों पर लिखे "वेज बिरयानी" शब्द पर आपत्ति जताई। साधु-संतों का कहना है कि हरिद्वार एक धार्मिक नगरी है और यहां वेज पुलाव को "वेज बिरयानी" के नाम से बेचना उचित नहीं है। अभियान के दौरान कई ठेलियों पर लगे "वेज बिरयानी" के बोर्ड या पोस्टरों पर "वेज पुलाव" के स्टिकर भी लगाए गए।
साधु-संतों की क्या है मांग?
अखंड परशुराम अखाड़े के पदाधिकारियों का कहना है कि हरिद्वार की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना जरूरी है। उनका मानना है कि खाद्य पदार्थों के नाम भी स्थानीय धार्मिक भावनाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप होने चाहिए। संतों ने दुकानदारों और रेहड़ी संचालकों से अपील की है कि वे अपने उत्पाद को "वेज बिरयानी" की जगह "वेज पुलाव" नाम से बेचें। उनका तर्क है कि इससे धर्मनगरी की सांस्कृतिक गरिमा बनी रहेगी, खासकर तब जब वर्ष 2027 में यहां महाकुंभ का आयोजन होना है।
मुस्लिम संघर्ष समिति ने जताई आपत्ति
इस अभियान के बाद मुस्लिम संघर्ष समिति ने साधु-संतों के रुख पर सवाल उठाए हैं। समिति के अध्यक्ष सोहेल अख्तर ने कहा कि वेज बिरयानी और वेज पुलाव के बीच कोई ऐसा बड़ा अंतर नहीं है, जिसके आधार पर विवाद खड़ा किया जाए। उन्होंने कहा कि किसी व्यंजन के नाम को लेकर विवाद पैदा करना समाज के लिए लाभदायक नहीं है। उनके अनुसार, नाम बदलने से न तो किसी की धार्मिक आस्था प्रभावित होती है और न ही इससे कोई सामाजिक समस्या हल होती है।
भाईचारे की परंपरा का दिया हवाला
सोहेल अख्तर ने कहा कि हरिद्वार हमेशा से सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक रहा है। यहां विभिन्न समुदायों के लोग एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों में सहयोग करते आए हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज भी धार्मिक पेशवाइयों और अन्य आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेता है और स्वागत करता है। उनके अनुसार, शहर की यही साझा सांस्कृतिक विरासत उसकी सबसे बड़ी पहचान है।
सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस
वेज बिरयानी और वेज पुलाव को लेकर शुरू हुई यह बहस अब सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है। कुछ लोग साधु-संतों की मांग का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कई लोग इसे अनावश्यक विवाद बता रहे हैं। हालांकि अभी तक प्रशासन की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन यह विवाद दिखाता है कि कई बार छोटे दिखने वाले मुद्दे भी सामाजिक और सांस्कृतिक बहस का रूप ले सकते हैं।
फिलहाल हरिद्वार में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ सामने आ रहे हैं। आने वाले दिनों में इस विवाद पर और प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।
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