ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
भारत और अमेरिका के बीच लंबी चर्चाओं के बाद वाणिज्यिक व्यापार (Trade Deal) पर सहमति का मार्ग खुलता दिख रहा है, लेकिन इस ऐतिहासिक कदम को लेकर देश में राजनीतिक बहस भी तेज़ हो गई है। खासकर कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार के लिए कई सवाल उठाए हैं, जो इस समझौते के प्रस्तावित असर पर केंद्रित हैं। यह ब्लॉग इसी पर विस्तार से चर्चा करेगा, ताकि आप आसानी से समझ सकें कि यह विवाद क्या है और इसके पीछे क्या-क्या मुद्दे हैं।
व्यापार समझौते को लेकर कांग्रेस की चिंता
जैसे ही भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की चर्चा बढ़ी, कांग्रेस ने मोदी सरकार से सवालों की एक लिस्ट जारी की, जिसमें वे पूछ रहे हैं कि क्या यह डील देश के हित के अनुरूप है या कुछ और मायने रखती है।
कांग्रेस ने फेसबुक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “एक्स” (X) पर लिखा कि ऐसा लगता है कि भारत ने अपना बाजार पूरी तरह अमेरिका के लिए खोल दिया है और यह डील सिर्फ अमेरिका के हित में ही बनाई जा रही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यह समझौता सीधे तौर पर किसानों, व्यापारियों और ऊर्जा सुरक्षा जैसी संवेदनशील मुद्दों को प्रभावित कर सकता है।
कृषि क्षेत्र पर सवाल
कांग्रेस ने प्रमुख तौर पर यह सवाल उठाया कि इस डील के प्रभाव में क्या भारत कृषि उत्पादों पर अमेरिकी बाजार खोल देगा? कांग्रेस का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो भारत के छोटे किसान और घरेलू कृषि उद्योगों को बड़ा नुकसान हो सकता है।
ऐसा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका कृषि क्षेत्र में सस्ते बड़े पैमाने पर उत्पादन वाले उत्पाद भेजता है, जिससे भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है। कांग्रेस ने सवाल किया कि क्या सरकार ने किसानों के हितों की पूरी जांच-परख की है और अगर यह डील लागू होती है तो इससे भारत के ग्रामीण इकाइयों पर पड़े असर पर क्या तैयारी है।
रूस से तेल खरीद को लेकर उठे सवाल
एक और बड़ा मुद्दा जो कांग्रेस ने उठाया है वह है रूस से तेल खरीद से जुड़े असर का सवाल। कांग्रेस ने पूछा कि क्या अब भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा और इसके बजाय अमेरिका या वेनेज़ुएला से तेल खरीदेगा? इससे भारत की ऊर्जा रणनीति पर क्या असर पड़ेगा और क्या इससे भारत-रूस के लंबे समय के रिश्तों पर प्रभाव पड़ेगा?
रूस से सस्ता तेल खरीदने की क्षमता भारतीय ऊर्जा बिल पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। अगर यह डील के चलते बदलती है, तो यह भारत के तेल आयात बिल को बढ़ा सकता है और कीमतों में उछाल ला सकता है। ऐसे में कांग्रेस का कहना है कि सरकार को पहले पूरी पारदर्शिता से देश को बताना चाहिए कि इस तरह के बदलाव से क्या-क्या परिणाम हो सकते हैं।
किसानों और व्यापारियों को क्या चिंता है?
कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि अगर अमेरिका से आयात की बाधाएं और कम हो जाती हैं, तो भारत में छोटे और मध्यम व्यवसाय (SMEs), खासकर टेक्सटाइल, कृषि उपकरणों और खाद्य प्रसंस्करण श्रेणियों में कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकते हैं।
यह भी सवाल उठाया गया है कि अगर अमेरिका से कृषि सामान और डेयरी उत्पाद बहुमात्रा में भारत में प्रवेश पाएँगे, तो भारतीय किसानों को नुकसान होने की संभावना होगी। कांग्रेस का कहना है कि सरकार को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसानों का संरक्षण और घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी गई है या नहीं।
क्या ‘मेक इन इंडिया’ कमजोर होता जा रहा है?
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया है कि अगर भारत ने अपना बाजार अमेरिका के लिए खुला छोड़ दिया और रूस से तेल की खरीद कम कर दी तो क्या इससे सरकार की “मेक इन इंडिया” नीति कमजोर नहीं पड़ेगी? उनके सवालों का कहना है कि यह समझौता “भारत को अमेरिका पर निर्भर बनाता हुआ दिखता है।”
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि सरकार को पहले देश को बताए कि इस डील के तहत भारत अपने घरेलू उद्योग और संरक्षणवादी नीतियों को कैसे सुरक्षित रखेगा, ताकि हमारी मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात-क्षमता और अधिक मजबूत बनी रहे।
राजनीतिक पक्ष और बहस का माहौल
कांग्रेस के सवालों ने संसद, सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर एक तेज़ राजनीतिक बहस छेड़ दी है। खासकर भाजपा और एनडीए समर्थकों ने इस डील का स्वागत किया है और इसे वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक रणनीति को मजबूत करना बताया है, जबकि कांग्रेस इसे ‘भरोसेमंद निर्णय’ के नाम पर आलोचना का विषय बना रही है।
बाजार और आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यह डील सफल रहती है और टैरिफ कम होता है, तो इससे भारतीय निर्यात को अमेरिका जैसे बड़े बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है। लेकिन राजनीतिक विरोध के मद्देनज़र यह मुद्दा संसद और चुनावी बहसों में लंबे समय तक बना रह सकता है।
क्या डील से वास्तविक लाभ होगा?
सवाल यह है कि आखिरकार यह डील भारत को वास्तविक लाभ देगी या नहीं? कांग्रेस का मानना है कि निर्णय से पहले जनता को सभी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि किसान, श्रमिक और व्यापारी जनता निर्णय-प्रक्रिया को समझ सके।
वहीं सरकार का तर्क है कि इस तरह के व्यापारिक समझौते लंबी अवधि में निवेश, रोजगार, निर्यात और आर्थिक वृद्धि को प्रेरित कर सकते हैं। साथ ही यह भी कहा जाता है कि बिना खोलें गए बाजार के बिना आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाना कठिन रहेगा।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!