ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को नए भेदभाव-रोधी नियम लागू किए, जिन्हें “2026 Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations” कहा जाता है। इन नियमों का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति, लिंग, धर्म, दिव्यांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना है और इसके तहत हर संस्था में इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वाड जैसी व्यवस्था बनाना अनिवार्य किया गया है।
लेकिन इन नियमों के लागू होते ही गंभीर विवाद खड़ा हो गया। इसकी वजह यह है कि कुछ मानते हैं कि नियम सामान्य (General) श्रेणी के छात्रों और व्यक्तियों को भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा से बाहर रखते हैं, जिससे न्यायपालिका में मामला पहुंच गया है। आज यानी 29 जनवरी 2026 सुप्रीम कोर्ट में इस विवाद पर प्रमुख सुनवाई होने वाली है, जिसकी निगरानी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी।
नए नियम क्या कहते हैं?
UGC के 2026 के नए नियमों में मुख्य तौर पर कहा गया है कि:
1. सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इक्विटी कमेटी (Equity Committees) बनाई जाएँगी।
2. इन समितियों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के साथ महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा।
3. शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव की शिकायतें इन समितियों के ज़रिये नियंत्रित व निपटाई जाएँगी।
इन नियमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि हर विद्यार्थी और कर्मचारी भेदभाव-रहित माहौल में पढ़ाई-लिखाई कर सके।
क्या विवाद हो रहा है?
नए नियमों को लेकर विवाद का मुख्य कारण जातिगत भेदभाव की परिभाषा और उसकी सीमा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नियमों की भाषा “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल SC, ST और OBC तक सीमित कर देती है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों और कर्मचारियों को सुरक्षा व्यवस्था के बाहर रखा जाना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
याचिका में कहा गया है कि यह नियम सामान्य वर्ग को संभावित पीड़ित (victim) के रूप में शामिल नहीं करता, जिसका मतलब यह हो सकता है कि वे भेदभाव की शिकायत नहीं कर सकते या उन्हें कोई अधिकार नहीं मिलेगा। इससे यह धारणा बन रही है कि नियम एकतरफा और असंगत हैं।
कुछ वकीलों का कहना है कि इससे नियम संवैधानिक रूप से गलत हैं क्योंकि भारतीय संविधान समानता और निष्पक्षता का अधिकार हर व्यक्ति को देता है, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग से क्यों न हो। याचिका में यह भी कहा गया है कि नियमों का यह स्वरूप भेदभाव को बढ़ावा दे सकता है और इसका दुरुपयोग हो सकता है।
देशभर में विरोध क्यों?
जैसे-जैसे नए नियम लागू हुए, देश के अलग-अलग हिस्सों में सामान्य श्रेणी के छात्रों और सामाजिक संगठनों का विरोध बढ़ गया। उन्हें लगता है कि नियमों के कारण उनके साथ भेदभाव हो सकता है और शिकायत करने की प्रक्रिया में सहमति-पूर्वक दिक्कतें आएँगी।
छात्र संगठन, पेरेंट्स और कई सामाजिक समूहों ने लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर और कई जगह प्रदर्शन किए हैं, जहां उन्होंने नियमों के खिलाफ पुतले जलाए, रैलियाँ निकालीं और बैठकों का आयोजन किया। कई जगहों पर विरोध इतना ज़ोरदार हुआ कि कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पद भी छोड़ दिया।
इस बीच, दूसरी ओर भी समर्थन का स्वर है। कुछ नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि नियम भेदभाव को रोकने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं और यदि सही तरीके से लागू किए जाएँ, तो इससे हर पृष्ठभूमि के छात्रों को सुरक्षा मिल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका क्या मांगती है?
याचिका में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि नियमों की धारा 3(c) में दी गई “जातिगत भेदभाव” की परिभाषा संवैधानिक रूप से तटस्थ या निष्पक्ष नहीं है और यह SC, ST तथा OBC तक ही सीमित है, जिससे सामान्य श्रेणी को न्याय के दायरे से अलग कर दिया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस तरह की परिभाषा धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से सामान्य वर्ग को न्याय के अधिकार से वंचित करती है, जो संविधान के लक्ष्य और समानता के अधिकार के खिलाफ है। वे अदालत से अनुरोध कर रहे हैं कि या तो इस धारा को रद्द किया जाए या इसे ऐसा बनाया जाए कि यह जाति-तटस्थ और सभी वर्गों के लिए लागू हो।
इसके अलावा याचिकाकर्ता चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट नियमों के त्वरित लागू होने पर रोक भी लगाए जब तक संशोधन नहीं हो जाता। यह एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो भविष्य के निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।
शिक्षा मंत्री और सरकार का बयान
इस पूरे विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने आश्वासन दिया है कि नए नियम किसी भी व्यक्ति के खिलाफ भेदभाव नहीं करेंगे और न ही इनके दुरुपयोग की अनुमति दी जाएगी। उन्होंने कहा है कि नियमों को लागू करने में सावधानी और संतुलन रखा जाएगा ताकि किसी भी समूह के साथ अन्याय न हो।
सरकार यह भी स्पष्ट कर रही है कि नियमों का मकसद समान अवसर और निष्पक्ष माहौल बनाना है, न कि किसी विशेष समुदाय को असुविधा देना। लेकिन आलोचक इसका कहना है कि नियमों की भाषा और ढांचा अभी भी अस्पष्ट है, जिस कारण विवाद बना हुआ है।
क्या भविष्य में बदलाव होंगे?
अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है, तो विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट अपने न्यायिक विवेचनाओं के दौरान यह देखेगी कि नियम संवैधानिक, निष्पक्ष और सभी वर्गों के लिए समान हैं या नहीं। यदि नियमों में कोई संवैधानिक कमी पाई जाती है, तो संभावना है कि उन्हें संशोधित या रद्द किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि नियमों में कुछ प्रक्रियात्मक और तकनीकी संशोधन से भी विवाद को शांत किया जा सकता है, जिसमें शिकायत निपटान की प्रक्रिया, दुरुपयोग रोकने के उपाय और सामान्य वर्ग के छात्रों की सुरक्षा भी शामिल हो सकती है।
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