कैसे बना अकाल तख्त जंग का मैदान? ऑपरेशन ब्लू स्टार की खौफनाक कहानी
ऑपरेशन ब्लू स्टार की खौफनाक हकीकत जानिए – कैसे भिंडरावाले ने अकाल तख्त को बना दिया युद्ध का अड्डा, कैसे सेना ने की घेराबंदी, और क्यों इसके बाद पूरे देश में मचा कोहराम।
कैसे बना अकाल तख्त जंग का मैदान? ऑपरेशन ब्लू स्टार की खौफनाक कहानी
  • Category: भारत

1 जून 1984 को जब सेना ने स्वर्ण मंदिर की घेराबंदी शुरू की, तो शायद ही किसी को अंदाज़ा रहा होगा कि अगले कुछ दिनों में पंजाब का दिल लहूलुहान होने वाला है।

एक ओर पाकिस्तानी हथियारों से लैस उग्रवादी, दूसरी तरफ देश की सेना… और बीच में फंसी सियासत की वो चिंगारी, जो धीरे-धीरे दावानल बन चुकी थी।


अकाल तख्त में भिंडरावाले का डेरा और हथियारों का अंबार

15 दिसंबर 1983 को जरनैल सिंह भिंडरावाले ने अकाल तख्त को अपना अड्डा बना लिया। वहीं से शुरू हुआ वो सिलसिला जो अंतत: ऑपरेशन ब्लू स्टार तक पहुंचा। 

मुख्यग्रंथी कृपाल सिंह को भी झुकना पड़ा क्योंकि गुरुचरण सिंह तोहड़ा का दबाव सिर पर था। और फिर शुरू हो गई स्वर्ण मंदिर की किलेबंदी।

देखते ही देखते भिंडरावाले के समर्थकों ने गुरुद्वारे को हथियारों का गोदाम बना दिया। इतना गोला-बारूद जमा हो चुका था कि सेना को भी घुटनों पर आने में वक्त नहीं लगा।


कांग्रेस की चाल या देशद्रोह की नींव?

दरअसल, इस पूरे खेल की शुरुआत 1977 के बाद हुई, जब पंजाब में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। जैल सिंह, जो पहले मुख्यमंत्री थे, खुद कटघरे में थे।

संजय गांधी का आइडिया था कि किसी संत को बढ़ावा दो जो अकालियों का विकल्प बने। यहीं से भिंडरावाले का नाम पिच पर आया।

जैल सिंह और दरबारा सिंह ने भिंडरावाले को दिल्ली के दरबार से मिलवाया। उसके तेवर तीखे थे, सो मंज़ूर हुआ। लेकिन जैसा अक्सर होता है, जिसे मोहरा समझा गया, वही वज़ीर बन बैठा।


भाषणों से बारूद तक: भिंडरावाले का आतंक

13 अप्रैल 1978 को सिख-निरंकारी संघर्ष ने पहली बार भिंडरावाले को सुर्खियों में ला खड़ा किया। 16 सिखों की मौत के बाद उसका नाम पंजाब के हर नुक्कड़ पर गूंजने लगा।

उसके भाषण अब ज़हर उगलने लगे थे। कहता कि "जो सरदार व्हिस्की पीते हैं, उन्हें केरोसिन में डुबोकर आग लगा दूंगा।"

खुशवंत सिंह जैसे बड़े पत्रकार तक उसके निशाने पर आ गए। हिंदुओं की हत्याएं आम बात हो चली थी।

पंजाब केसरी और हिंद समाचार जैसे अखबारों के मालिक तक मारे गए। डर ऐसा कि दिल्ली तक की नींव हिलने लगी।


राजनीति पीछे छूटी, बंदूकें आगे निकलीं

1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद सिख राजनीति में नरमपंथी कोनों में धकेल दिए गए। अब स्टेज पर सिर्फ भिंडरावाले था।

पाकिस्तान और चीन से सपोर्ट की बातें आम होने लगीं। और ये सारा कुछ हो रहा था एक धार्मिक स्थल की आड़ में।

अकाल तख्त पर कब्ज़ा कर वो न सिर्फ खुद को अजेय समझने लगा, बल्कि खुलेआम चुनौती देने लगा, कहा, कि "मुझसे टकराओ, पता चल जाएगा किसकी सरकार है।"


सेना की घेराबंदी और आर-पार की लड़ाई

1 जून 1984 से ऑपरेशन ब्लू स्टार की असली शुरुआत हुई। मगर ये कोई आम लड़ाई नहीं थी।

स्वर्ण मंदिर के भीतर सुरंगों में छिपे उग्रवादी, AK-47, ग्रेनेड और रॉकेट लॉन्चर से लैस थे।

सेना को गोलियों के बीच से रास्ता बनाना था, वो भी इस पवित्र स्थल को नुकसान पहुंचाए बिना।

6 जून की रात अमृतसर अंधेरे में डूबा था, और हर कोने से गोलियों की आवाज़ें आ रही थीं। टैंकों से अकाल तख्त पर हमला हुआ, जवान अंदर घुसे और धीरे-धीरे कब्ज़ा शुरू हुआ।


लाशों का ढेर और देश को लगे घाव

ऑपरेशन खत्म हुआ, मगर कीमत बहुत भारी थी। करीब 800 उग्रवादी मारे गए, जिनमें भिंडरावाले और दो पूर्व फौजी जनरल भी शामिल थे। सेना के भी 200 जवान शहीद हो गए।

उधर, इसका असर जल्द ही दिखा। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की उनके ही दो सिख बॉडीगार्ड्स ने गोली मारकर हत्या कर दी।

फिर जो हुआ वो भी इतिहास है… सिख विरोधी दंगे, पंजाब में विद्रोह और एक लंबा खूनी दौर।


जख्म आज भी हरे हैं…

ऑपरेशन ब्लू स्टार के ज़ख्म आज भी पंजाब के मानस में ताजे हैं। एक धार्मिक स्थल को जंग का मैदान बना देना आसान फैसला नहीं था।

मगर ये भी सच है कि जिस आग को कुछ सियासी चालों से जलाया गया, वो पूरे देश को झुलसा गई।

ये कहानी थी उस दौर की, जब राजनीति ने बंदूक को रास्ता दिखाया और पूरे मुल्क ने उसकी कीमत चुकाई।

आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।

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