ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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मध्य प्रदेश के खंडवा में AIMIM ने सदस्यता अभियान के जरिए संगठन बढ़ाने की कोशिश तेज कर दी है। इसी कार्यक्रम के दौरान पार्टी के राज्य स्तर के नेता मोहसिन अली का बयान चर्चा में आ गया, जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर सीधा हमला बोला। मुद्दा सिर्फ बयानबाज़ी का नहीं था, बल्कि यह संकेत भी था कि AIMIM अब मध्य प्रदेश में खुद को ज्यादा मजबूत तरीके से पेश करना चाहती है।
विवाद की शुरुआत: शिंदे का बयान और AIMIM की नाराज़गी
हाल के दिनों में एकनाथ शिंदे का एक बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने AIMIM के बढ़ते प्रभाव को देश के लिए खतरा बताया था। इसी बात पर AIMIM ने कड़ा रुख अपनाया और खंडवा में मंच से जवाब दिया। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप नई बात नहीं, लेकिन जब किसी पार्टी को “देश के लिए खतरा” कहा जाता है, तो जवाब भी आमतौर पर उतना ही तेज आता है।
“हिंदुस्तान में नहीं लड़ेंगे तो क्या पाकिस्तान जाएंगे?”
मोहसिन अली के बयान की सबसे ज्यादा चर्चा इसी लाइन को लेकर हुई—उन्होंने कहा कि अगर “हमारे नौजवान” हिंदुस्तान में चुनाव नहीं लड़ेंगे, तो क्या पाकिस्तान जाकर लड़ेंगे? उन्होंने आगे बांग्लादेश, चीन और अफगानिस्तान जैसे देशों का जिक्र करते हुए तंज कसा कि जीत भी यहीं हासिल करनी है। यह बयान सीधे तौर पर शिंदे के आरोप का जवाब था और AIMIM ने इसे “अपने देश में राजनीतिक हक” की दलील की तरह रखा।
शिंदे पर निजी और राजनीतिक हमला भी
यहीं बात खत्म नहीं हुई। मोहसिन अली ने शिंदे पर निजी और राजनीतिक दोनों तरह के तीखे हमले किए। उन्होंने आरोप लगाया कि शिंदे “वक्त-वक्त पर बाप बदलते हैं” और अपने राजनीतिक सफर में अलग-अलग खेमों के साथ रहे हैं। इस तरह के शब्द राजनीति में विवाद बढ़ा देते हैं और बयान का तापमान और ऊपर चला जाता है।
“हर बाशिंदा इसी हिंदुस्तान में लड़ेगा”
AIMIM नेता ने यह भी कहा कि इस देश का हर बाशिंदा हिंदुस्तान में ही चुनाव लड़ेगा और इसी देश में जीतेगा। पार्टी ने यह लाइन यह बताने के लिए रखी कि नागरिक और राजनीतिक अधिकार किसी एक विचारधारा के बंधक नहीं हैं। उनका फोकस यह दिखाने पर रहा कि चुनाव लड़ना लोकतंत्र का हिस्सा है और इसे “खतरा” बताकर किसी को बाहर नहीं किया जा सकता।
AIMIM की रणनीति: महाराष्ट्र के बाद MP पर नजर
खंडवा के कार्यक्रम में यह भी संकेत मिला कि AIMIM अब मध्य प्रदेश में संगठन विस्तार को प्राथमिकता दे रही है। सदस्यता अभियान जैसे कार्यक्रम अक्सर चुनाव से पहले पार्टी की ग्राउंड तैयारी का हिस्सा होते हैं—यही वह दौर होता है जब बूथ स्तर तक लोग जोड़े जाते हैं और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ बनाई जाती है। महाराष्ट्र में पार्टी के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए भी यह संदेश देने की कोशिश दिखी कि AIMIM अब दूसरे राज्यों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहती है।
बयानबाज़ी का असर: राजनीति और ध्रुवीकरण की बहस
शिंदे और AIMIM के बीच इस तरह की तकरार का असर केवल दो नेताओं तक सीमित नहीं रहता। ऐसे बयानों के बाद सोशल मीडिया, टीवी डिबेट और स्थानीय राजनीति में भी ध्रुवीकरण वाली बहस तेज हो जाती है। यही वजह है कि खंडवा में कही गई लाइनें अब मध्य प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का हिस्सा बन गई हैं।
आगे क्या—संगठन बनाम विवाद?
AIMIM के लिए एक तरफ संगठन बढ़ाने की चुनौती है, दूसरी तरफ ऐसे बयान पार्टी को सुर्खियों में भी ले आते हैं। अब देखना यह होगा कि पार्टी मध्य प्रदेश में किस तरह के मुद्दों के साथ आगे बढ़ती है—स्थानीय समस्याएं, रोजगार, शिक्षा, या पहचान की राजनीति। फिलहाल इतना तय है कि खंडवा के मंच से आया जवाब महाराष्ट्र की राजनीति तक ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहस तक पहुंच चुका है।
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