लोकसभा हंगामा: तेजस्वी सूर्या के बयान से भड़के राहुल गांधी, पूर्व सेना प्रमुख नरवणे के जिक्र पर राजनीति गरमाई
लोकसभा के बजट सत्र में तेजस्वी सूर्या के बयान के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की किताब का हवाला दिया, जिससे संसद में हंगामा और विपक्ष-सत्ताधारी दल के बीच तीखी नोकझोंक हुई।
लोकसभा हंगामा: तेजस्वी सूर्या के बयान से भड़के राहुल गांधी, पूर्व सेना प्रमुख नरवणे के जिक्र पर राजनीति गरमाई
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भारत की संसद, लोकसभा, हमेशा से ही लोकतांत्रिक बहसों और राजनीतिक टकराव का केंद्र रही है। लेकिन 2 फ़रवरी 2026 को जहाँ बजट सत्र चल रहा था, उसी दिन एक साधारण सा बयान तेजस्वी सूर्या की ओर से शुरू होकर पूरे सदन में एक बड़ा हंगामा खड़ा कर गया। इस घटना में मुख्य रूप से शामिल थे राहुल गांधी, राजनाथ सिंह, अमित शाह, और बाद में अखिलेश यादव, जिसने इस मामले को और व्यापक राजनीतिक बहस में बदल दिया।

 

तेजस्वी सूर्या का बयान — शुरुआत कहां से हुई?

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने उठकर केंद्र सरकार की उपलब्धियों का समर्थन किया और पूर्व शासन की नीतियों की तुलना में वर्तमान सरकार की तारीफ की। उन्होंने यूपीए के शासनकाल (2004-2014) को ‘नीतिगत अयोज्यता और भ्रष्टाचार’ जैसे शब्दों से संबोधित किया और सत्‍ता पक्ष की उपलब्धियों को उजागर किया।

 

तेजस्वी सूर्या की बात का प्रमुख निशाना रहा कांग्रेस और राहुल गांधी की देशभक्ति और न्यायिक पक्षधरता — उन्होंने कांग्रेस पर सवाल उठाए कि पार्टी देश के हितों के प्रति कितनी जिम्मेदार है। यह टिप्पणी बहुतों को मामूली लग सकती थी, लेकिन विपक्ष के लिए यह एक ऐसा मुद्दा बन गया जिसने पूरी बहस का स्वर बदल दिया।

 

राहुल गांधी का कड़ा जवाब

जैसे ही तेजस्वी सूर्या का बयान समाप्त हुआ, लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने उठकर जवाब देना शुरू किया। उन्होंने कहा कि सिर्फ सरकार का समर्थन करने के बजाए यह देखा जाना चाहिए कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और नीति में क्या गलत हो रहा है। राहुल गांधी ने संसद में **पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की किताब के कुछ अंशों का हवाला देने की कोशिश की।

 

राहुल गांधी के अनुसार, नरवणे की किताब में चीन के साथ तनावपूर्ण परिस्थितियों और सीमाई मुद्दों पर जो परिस्थितियाँ लिखी गई हैं, उन पर चर्चा करना ज़रूरी था। उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि किसकी देशभक्ति और रणनीति वास्तव में मजबूत है। लेकिन इस अंश का हवाला देना ही विवादित बन गया।

 

संसद में हंगामा और सत्ताधारी दल की आपत्ति

जैसे ही राहुल गांधी ने अप्रकाशित किताब से उद्धरण पढ़ना शुरू किया, सत्ताधारी दल के सांसद और केंद्रीय मंत्री — विशेषकर अमित शाह और राजनाथ सिंह — ने इस पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि संसद में केवल आधिकारिक और प्रकाशित स्रोतों का ही हवाला दिया जाना चाहिए, न कि किसी अप्रकाशित या संदिग्ध सामग्री का।

 

राजनाथ सिंह और अमित शाह ने जोर देकर कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों को बिना पुख़्ता जानकारी के शामिल नहीं किया जाना चाहिए, और ऐसी सामग्री का उपयोग सदन में उचित नहीं है। इससे सदन में तर्क-वितर्क, नारेबाज़ी और हंगामा शुरू हो गया।

 

स्पीकर-चा‍यर का भूमिका और सत्र का प्रभावित होना

हंगामा इतना तेज़ था कि लोकसभा की कार्यवाही को रोककर सदन को अड्जर्न (स्थगित) करना पड़ा। यह दर्शाता है कि साधारण सा बयान किस तरह से एक बड़े विवाद में बदल सकता है जब वह राष्ट्रवाद और रक्षा नीति जैसे संवेदनशील विषयों से जोड़ दिया जाता है।

 

जब संसद का संचालन मुश्किल हो गया, तो स्पीकर को सदन को नियंत्रित करने और नियमों के पालन पर जोर देने का प्रयास करना पड़ा, लेकिन दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे।

 

अखिलेश यादव का समर्थन और विपक्ष की एकता

जैसे ही बहस और हंगामा बढ़ा, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी राहुल गांधी का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि चीन जैसे सुरक्षा से जुड़े मामलों पर गंभीर चर्चा होना जरूरी है और नेता प्रतिपक्ष को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए। यह समर्थन विपक्षी दलों के बीच एकता का संकेत था और राजनीति में एक सामूहिक प्रतिक्रिया को जन्म दिया।

 

उन्होंने कहा कि चाहे संसद में बहस हो या बाहर, ऐसे मुद्दों को राजनीतिकरण करने के बजाए समझदारी से उठाया जाना चाहिए ताकि जनता के सामने महत्वपूर्ण नीतिगत सवाल स्पष्ट हो सकें।

 

संसद के बाहर भी जारी राजनीतिक चर्चाएँ

संसद से बाहर राहुल गांधी ने कहा कि उनके बयान को गलत ढंग से पेश किया जा रहा है और उनका मकसद देश और उसकी सुरक्षा पर सच्चाई उजागर करना था। उन्होंने यह भी कहा कि उनके बयान को “संवेदनशील” विषयों से जोड़कर पेश किया जा रहा है, जबकि वे केवल तथ्यों पर आधारित चर्चा चाहते थे।

 

कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्य शशि थरूर ने भी टिप्पणी की कि सरकार को इस तरह प्रतिक्रिया देने की बजाय खुलकर चर्चा को प्रोत्साहित करना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में बहस और विचारों का आदान-प्रदान अहम है।

 

राजनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर

इस पूरे विवाद ने यह स्पष्ट किया कि संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और देशभक्ति जैसे मुद्दों पर किसी भी टिप्पणी का प्रभाव बहुत गहरा हो सकता है। जब ऐसे विषय सीधे राजनीतिक बहस में आ जाते हैं, तो संसदीय प्रक्रिया और नियमों का पालन करना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

 

देशभर में भी यह घटना राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गई है कि क्या संसद में किसी पूर्व सेवा प्रमुख की अप्रकाशित सामग्री को उद्धृत करना चाहिए या नहीं, और कब तक ऐसे मामलों को राजनीति से जोड़ा जाना चाहिए।


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