ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जब विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान स्थानीय विधायक राजा भैया के परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची से निकाल दिए गए। इस विवाद ने न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रतापगढ़ की सियासत में भी हलचल पैदा कर दी है।
SIR एक विधिक प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए एक विस्तृत समीक्षा की जाती है। ऐसी समीक्षा में ऐसे मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं जिनकी पहचान समस्या, स्थानांतरण, मृत्यु या अन्य दोषों का पता चलता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य ही मतदाता सूची को शुद्ध और वैध बनाना है।
कुंडा विधायक के परिवार के नाम कैसे हटे?
SIR समीक्षा के बाद कुंडा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रघुराज प्रताप सिंह (राजा भैया) की पत्नी भानवी सिंह और उनकी दोनों बेटियों — राघवी कुमारी और विजय राजेश्वरी कुमारी के नाम वोटर लिस्ट से गायब कर दिए गए। यह अचानक बदलाव देखने में आया, क्योंकि पिछले मतदाता सूचियों में यह सभी नाम नियमित रूप से दर्ज थे।
भानवी सिंह ने कहा है कि उन्होंने 2003 से लगातार कुंडा की मतदाता सूची में अपने नाम का दर्ज होना देखा और वर्ष 2025 की वोटर लिस्ट में भी उनका नाम ठीक तरह से दर्ज था, लेकिन नई SIR सूची से अचानक तौर पर उनका नाम और बेटियों के नाम हटा दिए गए। वे इस कार्रवाई को समझने योग्य नहीं मानतीं।
भानवी सिंह ने शिकायत क्यों की?
भानवी सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और निर्वाचन आयोग को खुला पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने SIR प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके परिवार के नाम जानबूझकर हटाए गए हैं और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और उनके संवैधानिक मताधिकार का उल्लंघन है।
उनकी मांग है कि:
SIR प्रक्रिया के बारे में समझें
SIR या विशेष गहन पुनरीक्षण को निर्वाचन आयोग की एक प्रणाली के रूप में लागू किया जाता है ताकि वोटर रोल अधिक सटीक और अपडेट रहे। इसके तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने, संशोधन करने और अप्रासंगिक नाम हटाने जैसे काम होते हैं।
यह प्रक्रिया अक्सर ड्राफ्ट सूची के प्रकाशन के बाद लोगों को आपत्ति दर्ज कराने के मौके देती है ताकि जो नाम गलती से हट गए हों या गलत तरीके से हटाए गए हों, उसे वापस जोड़ा जा सके। राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में भी SIR प्रक्रिया के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिनमें मृत, स्थानांतरित, लापता और डुप्लीकेट नाम शामिल हैं।
क्या SIR प्रक्रिया विवादों से मुक्त है?
हालांकि SIR प्रक्रिया का उद्देश्य अच्छे मतदाता डेटा को सुनिश्चित करना है, परन्तु कई बार इसके साथ विवाद भी जुड़े हैं। उदाहरण के तौर पर पश्चिम बंगाल में 58 लाख से अधिक नाम हटाए गए, जिनके बारे में निर्वाचन आयोग ने चेतावनी दी कि मतदाता स्थिति की जांच कर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है। अन्य राज्य जैसे राजस्थान में भी लाखों नामों को ड्राफ्ट सूची से हटाया गया और मतदाताओं को अपनी स्थिति सुधारने का मौका दिया गया।
ऐसे समय में जब SIR की प्रक्रिया व्यापक पैमाने पर चल रही है, राजा भैया के परिवार के नाम हटने की खबर ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या यह पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष तौर पर चल रही है या कुछ अधिकारियों या दबावों के कारण पक्षपात हुआ है। भानवी का दावा है कि यह कृत्य पक्षपातपूर्ण है और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
राजा भैया का परिवार प्रतापगढ़ में एक जाना-पहचाना चेहरा रहा है और पिछले कई वर्षों से स्थानीय राजनीति में उनकी मजबूत उपस्थिति रही है। इस घटना ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को जन्म दिया है और कई लोग इस कदम के राजनीतिक निहितार्थों पर भी सवाल उठा रहे हैं।
भानवी सिंह के पत्र के बाद कई सामाजिक समूहों और स्थानीय जनता ने मतदाता सूची की सत्यता और निष्पक्षता के बारे में सवाल उठाए हैं। कुछ लोगों ने कहा है कि अगर किसी नाम को हटाया जाना है, तो इसके लिए पारदर्शी और स्पष्ट व्याख्यात्मक आधार होना चाहिए ताकि किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व या मताधिकार पर छेड़छाड़ न हो।
क्या यह सिर्फ एक परिवार का मामला है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक को मत देने का अधिकार मिलता है और मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब है उस नागरिक के मताधिकार पर सीधा असर। भानवी ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि उनके पति का प्रचारित आश्वासन था कि किसी भी सही तरीके से दर्ज मतदाता का नाम हटाया नहीं जाएगा, लेकिन उनके परिवार के साथ ऐसा हुआ।
ऐसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि मतदाता सूची को अपडेट करते समय न्याय और पारदर्शिता बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी गलती से मतदाताओं के अधिकार को नुकसान पहुँच सकता है।
भविष्य में क्या होने की संभावना है?
अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले पर कैसे प्रतिक्रिया देती हैं। भानवी ने मुख्यमंत्री और आयोग को पत्र भेज दिया है जिससे एक औपचारिक जवाब और कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है। अगर नाम वापस नहीं जोड़े जाते, तो आगामी कानूनी चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं।
कई विशेषज्ञ यह बताते हैं कि SIR प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और लोगों को अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का स्पष्ट तरीका उपलब्ध कराने की जरूरत है, ताकि ऐसे विवादों को भविष्य में रोका जा सके।
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