ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
महाराष्ट्र के जिला परिषद चुनावों के नतीजे आ गए हैं और इन नतीजों ने राज्य की राजनीति में नए संकेत दे दिए हैं। 12 जिला परिषदों में हुए चुनाव में बीजेपी 225 सीटों के साथ सबसे आगे रही, जबकि अजित पवार गुट की एनसीपी 172 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी।
एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 162 सीटें मिलीं,
कांग्रेस को 55, उद्धव ठाकरे की शिवसेना को 46
और एनसीपी के शरद पवार गुट को 21 सीटों पर जीत
मिली है।
इन आंकड़ों ने साफ कर दिया कि स्थानीय स्तर पर गठबंधन, सहानुभूति और क्षेत्रीय नेतृत्व—तीनों का असर इस बार खुलकर दिखा।
इन चुनावों को
सिर्फ “जिला परिषद” की राजनीति समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गांव-देहात और
कस्बों में ये संस्थाएं विकास के काम, ठेके,
सड़क-पानी जैसे मुद्दों और स्थानीय नेतृत्व की पहचान तय करती हैं।
इसलिए यहां की जीत-हार आगे होने वाले बड़े चुनावों के लिए जमीन
तैयार करती है, और पार्टियों को यह भी बताती है कि उनका
संगठन किस इलाके में मजबूत है और कहां कमजोर।
अजित पवार के निधन के बाद दिखी सहानुभूति की लहर
रिपोर्ट के
मुताबिक अजित पवार के निधन के बाद चुनावी समीकरणों में बड़ा बदलाव देखा गया और
उनकी पार्टी को कई जगह सहानुभूति का फायदा मिला।
इसी सहानुभूति की लहर के दम पर अजित पवार गुट की एनसीपी 12 जिला परिषदों में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
खास तौर पर पुणे और पश्चिमी महाराष्ट्र के हिस्सों में पार्टी का
प्रभाव बढ़ता हुआ नजर आया।
राजनीति में
सहानुभूति का असर अक्सर तुरंत दिखता है—लोग किसी नेता के लिए सम्मान और भावनात्मक
जुड़ाव के चलते उसके दल के साथ खड़े हो जाते हैं।
इस बार भी यही माहौल कई सीटों पर दिखा, जहां
प्रचार के दौरान अजित पवार को श्रद्धांजलि देने और उनकी विरासत की बात करने से
वोटरों का रुझान प्रभावित हुआ बताया गया है।
पुणे में एनसीपी का “गेम-चेंजर” प्रदर्शन
पुणे जिला
परिषद की 73 सीटों में से अजित पवार की एनसीपी
ने 51 सीटें जीतने का दावा किया है, जबकि
पिछली बार यह आंकड़ा 43 था।
शरद पवार गुट यहां सिर्फ 1 सीट जीत सका,
और बीजेपी के हिस्से 10 सीटें आईं।
पुणे का यह नतीजा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे एनसीपी का बड़ा
गढ़ माना जाता रहा है और यहां का मूड अक्सर पूरे पश्चिमी महाराष्ट्र का संकेत देता
है।
पुणे में यह
जीत सिर्फ संख्या की जीत नहीं है, यह “कंट्रोल” की
जीत भी मानी जा रही है—यानी संगठन, स्थानीय चेहरों और प्रचार
रणनीति की।
जब कोई पार्टी किसी मजबूत इलाके में अपना पिछला रिकॉर्ड भी बेहतर कर
ले, तो विरोधियों के लिए यह संदेश होता है कि यहां मुकाबला
आसान नहीं रहने वाला।
सतारा, कोल्हापुर, सोलापुर और सांगली: अलग-अलग कहानी
सतारा में
मुकाबला कड़ा रहा, और बीजेपी ने 23
सीटें जीतकर बढ़त बनाई।
वहीं शिंदे गुट को 13 सीटें और एनसीपी को 21
सीटें मिलीं—यानी यहां वोट बंटवारे और गठबंधन की रणनीति दोनों का
रोल दिखा।
कोल्हापुर में एनसीपी ने 20 सीटें जीतीं,
कांग्रेस को 14 और बीजेपी को 12 सीटें मिलीं, जिससे साफ है कि इस क्षेत्र में त्रिकोणीय
मुकाबला बना रहा।
सोलापुर में
बीजेपी ने पहली बार अपने दम पर जिला परिषद की सत्ता हासिल करने की बात कही गई है;
यहां 68 में से बीजेपी ने 38 सीटें जीतीं।
सांगली में शरद पवार गुट की एनसीपी 18 सीटों
के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, बीजेपी को 16 सीटें मिलीं; साथ ही महायुति 31 सीटों के साथ और एमवीए 30 सीटों के साथ बेहद करीब
रहे।
ये नतीजे बताते हैं कि राज्य के अलग-अलग जिलों में अलग मुद्दे,
अलग समीकरण और अलग नेतृत्व काम कर रहा है।
महायुति बनाम महाविकास: साथ भी, खिलाफ भी
इन चुनावों में
एक दिलचस्प बात यह रही कि सत्ताधारी महायुति के घटक—बीजेपी,
शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी—कुछ जगह साथ लड़े,
तो कई जगह एक-दूसरे के खिलाफ भी उतर गए।
जब सहयोगी दल एक ही इलाके में आमने-सामने होते हैं, तो मुकाबला “विरोधी को हराने” से ज्यादा “अपना वजूद दिखाने” का बन जाता
है।
यही कारण है कि कई जिलों में गठबंधन होते हुए भी वोटों का बंटवारा
हुआ और सीटों का गणित अलग दिशा में गया।
दूसरी तरफ
महाविकास अघाड़ी के लिए भी यह चुनाव एक तरह का टेस्ट रहा—कहां संगठन चल रहा है,
और कहां स्थानीय नेतृत्व कमजोर पड़ रहा है।
कांग्रेस की 55 सीटें और उद्धव गुट की 46
सीटें यह दिखाती हैं कि कुछ क्षेत्रों में पकड़ है, लेकिन कुल रुझान बीजेपी और एनसीपी (अजित गुट) की तरफ मजबूत दिखा।
इन नतीजों का मतलब आम लोगों के लिए क्या है
जिला परिषद और
पंचायत समिति के चुनाव अक्सर “लोकल काम” से सीधे जुड़े होते हैं—जैसे गांव की सड़क,
पानी की लाइन, स्कूल की बाउंड्री, स्वास्थ्य केंद्र, और ग्रामीण रोजगार।
इसलिए इन नतीजों का असर सिर्फ राजनीतिक दलों पर नहीं, आम लोगों की उम्मीदों पर भी पड़ता है कि अब उनके इलाके में काम कितनी तेजी
से होगा।
जिस पार्टी को बहुमत या बढ़त मिलती है, उससे लोग
तुरंत बदलाव की उम्मीद करने लगते हैं—और अगर काम नहीं हुआ, तो
वही लोग अगली बार सबसे पहले नाराज भी होते हैं।
आगे की राजनीति में क्या संकेत हैं
इन चुनाव
नतीजों से तीन बड़े संकेत निकलते दिख रहे हैं। पहला, बीजेपी का संगठन अभी भी कई जिलों में मजबूत है और वह शीर्ष पर रही है।
दूसरा, अजित पवार गुट की एनसीपी ने 172
सीटें जीतकर यह दिखाया कि उसके पास अपना वोट और क्षेत्रीय पकड़ है,
खासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में।
तीसरा, अलग-अलग जिलों में गठबंधन की “एक जैसी
रणनीति” नहीं चली—कहीं साथ लड़े, कहीं टक्कर हुई, और उसी ने कई जगह परिणाम तय कर दिए।
अब सबकी नजर इस
पर रहेगी कि ये दल अपने-अपने इलाकों में जीती हुई सीटों के जरिए जमीनी काम कैसे
करते हैं,
और क्या यह प्रदर्शन आगे होने वाले बड़े चुनावों के लिए ट्रेंड सेट
करता है।
स्थानीय चुनावों की यही खासियत है—यह जनता के मूड को “छोटे पैमाने”
पर तुरंत दिखा देते हैं, और पार्टियों को अपनी कमजोरी-ताकत
का आईना भी।
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