ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने बीजेपी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बीजेपी के लिए “भगवान राम नहीं, असदुद्दीन ओवैसी ही अकेले भगवान हैं।”
उन्होंने यह बात एक प्रेस मीट के दौरान कही और आरोप लगाया कि बीजेपी
राम का नाम “दिखावे” के लिए लेती है, जबकि राजनीति में वह
बार-बार ओवैसी के नाम को सामने रखकर वोट मांगती है।
रेड्डी ने इसे बीजेपी की राजनीति का पुराना तरीका बताया और कहा कि
अगर आप बीजेपी की राजनीति को “एनालाइज” करें तो उनके लिए सबसे बड़ा सहारा ओवैसी का
नाम ही है।
रेवंत रेड्डी का यह बयान इसलिए भी
चर्चा में है क्योंकि तेलंगाना की राजनीति में बीजेपी,
कांग्रेस और AIMIM का रिश्ता अक्सर तीखे
आरोपों और रणनीति के बीच चलता रहा है।
ऐसे में जब मुख्यमंत्री स्तर से इस तरह का कटाक्ष आता है, तो उसका असर सिर्फ एक दिन की सुर्खी नहीं रहता—वह चुनावी माहौल, सोशल मीडिया बहस और पार्टियों के जवाबी बयानों तक पहुंच जाता है।
रेड्डी ने इस बयान में साफ संकेत दिया कि बीजेपी जनता के मुद्दों पर
बात करने की बजाय “भय” और “धार्मिक भावनाओं” के सहारे चुनावी फायदा लेने की कोशिश
करती है।
“BJP की लाइफलाइन ओवैसी”—रेड्डी का आरोप
प्रेस मीट में रेवंत रेड्डी ने कहा कि
लोग जैसे “लाइफलाइन” की बात करते हैं, वैसे
ही बीजेपी की लाइफलाइन असदुद्दीन ओवैसी हैं।
उन्होंने मीडिया के सामने यह सवाल भी रखा कि बीजेपी कितनी बार ओवैसी
का नाम लिए बिना राम का नाम लेती है, और कितनी बार ओवैसी का
नाम लेकर राजनीति करती है—इसकी जांच होनी चाहिए।
रेड्डी ने दावा किया कि बीजेपी हर बार ओवैसी को “अलादीन का जादुई
चिराग” बनाकर वोट मांगती है।
राजनीति में यह तरीका नया नहीं है—कई
पार्टियां एक “टारगेट” चेहरा चुनकर उसे बार-बार सामने लाती हैं,
ताकि समर्थकों को एक आसान कहानी मिल जाए: “हम बनाम वो।”
रेवंत रेड्डी के मुताबिक बीजेपी यही कर रही है: जनता को असली कामकाज
से हटाकर एक नाम के इर्द-गिर्द चुनावी बहस घुमा देना।
उन्होंने इस बयान से बीजेपी पर यह आरोप लगाया कि वह मुद्दों की
राजनीति नहीं, बल्कि “डर दिखाकर” वोट जुटाने की राजनीति करती
है।
“अगर ओवैसी विलेन हैं, तो कंट्रोल क्यों नहीं?”
रेड्डी का सबसे तीखा सवाल यही रहा:
“अगर असदुद्दीन ओवैसी इतने विलेन हैं, तो
आप उन्हें कंट्रोल क्यों नहीं कर पा रहे?”
उन्होंने कहा कि “सरकारें आपकी ही हैं,” फिर
भी बीजेपी सिर्फ उन्हें “भूत” बताकर वोट मांगती रहती है।
रेड्डी ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में AIMIM भी
एक राजनीतिक पार्टी है जो चुनाव लड़ती है—जहां जीतती है, जीतती
है; जहां हारती है, हारती है।
इस तर्क के जरिए रेवंत रेड्डी ने दो
बातें एक साथ रखीं।
पहली, किसी पार्टी या नेता को “विलेन” कहकर
राजनीति करना आसान है, लेकिन उससे जिम्मेदारी खत्म नहीं
होती।
दूसरी, अगर कोई पार्टी वाकई किसी मुद्दे को
गंभीर मानती है, तो उसे सिर्फ भाषणों में नहीं, नीति और काम के स्तर पर दिखाना चाहिए।
AIMIM के चुनावी रिकॉर्ड का जिक्र
रेवंत रेड्डी ने कहा कि AIMIM
ने गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी चुनाव लड़ा है, और पश्चिम बंगाल में उनके पांच सीटें जीतने की बात भी उन्होंने कही।
उन्होंने यह बताकर यह दिखाने की कोशिश की कि AIMIM एक सक्रिय राजनीतिक संगठन है, जो अलग-अलग राज्यों
में अपने बल पर चुनाव लड़ती है।
रेड्डी का सवाल था कि बीजेपी कब तक उन्हें “भूत” बताकर वोट मांगती
रहेगी।
यह बात राजनीतिक बहस को एक अलग दिशा
देती है।
अगर AIMIM अलग-अलग जगह चुनाव लड़ रही है,
तो उसे सिर्फ “डर का प्रतीक” बनाकर पेश करने से पूरी तस्वीर साफ
नहीं होती।
रेवंत रेड्डी ने इसी संदर्भ में बीजेपी की रणनीति पर सवाल उठाया और
जनता से भी सोचने को कहा कि वे किस तरह की राजनीति को समर्थन देना चाहते हैं।
“धार्मिक नफरत भड़काना सोच की गरीबी”—रेड्डी
मुख्यमंत्री ने कहा कि सिर्फ धार्मिक
नफरत भड़काना, कुछ नेताओं को शैतान बताना और
उसके जरिए राजनीतिक तौर पर जिंदा रहने की कोशिश करना “सोच की गरीबी की हद” है।
उन्होंने कहा कि इस सोच को देखते हुए तेलंगाना के लोगों को सोचना
चाहिए कि बीजेपी को वोट देना चाहिए या नहीं।
यह बयान सीधे तौर पर बीजेपी के चुनावी नैरेटिव पर हमला माना जा रहा
है, क्योंकि इसमें “धर्म” और “वोट” दोनों संदर्भ एक साथ आ
गए।
राजनीति में जब कोई नेता “सोच की
गरीबी” जैसे शब्दों का उपयोग करता है, तो
वह विरोधी पार्टी की नीति नहीं, उसकी मानसिकता पर चोट करता
है।
ऐसी भाषा समर्थकों को जोड़ती भी है और विरोधियों को उकसाती भी
है—यही वजह है कि यह बयान तेजी से चर्चा में आ गया।
आने वाले दिनों में इस पर बीजेपी की तरफ से जवाब या पलटवार भी देखने
को मिल सकता है।
रेवंत रेड्डी और ओवैसी के रिश्तों पर भी चर्चा
रिपोर्ट के मुताबिक 2023
विधानसभा चुनाव के समय रेवंत रेड्डी और ओवैसी एक-दूसरे पर खुलकर
हमले करते थे।
कांग्रेस की सरकार बनने के बाद रेवंत रेड्डी ने AIMIM के साथ विकास के मुद्दों पर सहयोग की बात शुरू की और कई बार ओवैसी की
तारीफ भी की है।
हालांकि दोनों के बीच कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है, लेकिन हैदराबाद और तेलंगाना की राजनीति में व्यावहारिक सहयोग और अच्छे
संबंध दिखते रहे हैं।
यही वजह है कि रेवंत रेड्डी का ताजा
बयान सिर्फ बीजेपी विरोध तक सीमित नहीं माना जा रहा।
कुछ लोग इसे तेलंगाना में “नई राजनीतिक गणित” के संकेत के तौर पर भी
देख रहे हैं, जहां विकास के मुद्दों पर अलग-अलग दल कभी-कभी
साथ आते हैं।
ऐसे में यह बयान एक साथ कई संदेश देता है—बीजेपी पर हमला, वोटरों को अपील, और राज्य की राजनीति में अपनी
रणनीति का इशारा।
आगे की राजनीति किस तरफ जाएगी?
रेवंत रेड्डी के बयान के बाद यह देखना
दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस पर कैसे प्रतिक्रिया देती है और क्या यह मुद्दा आने
वाले चुनावी प्रचार का हिस्सा बनता है।
साथ ही, AIMIM की भूमिका और कांग्रेस सरकार के
साथ उसके “व्यावहारिक रिश्तों” पर भी चर्चा बढ़ सकती है।
फिलहाल इतना साफ है कि तेलंगाना में बयानबाजी अब सिर्फ नीतियों पर
नहीं, चुनावी रणनीति और नैरेटिव पर भी ज्यादा टिक गई है।
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