ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों एक नए विवाद के कारण काफी गर्म हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह मामला केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे राज्य की चुनावी राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।
ममता बनर्जी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के वोट देने के अधिकार पर असर पड़ सकता है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को ज्यादा पारदर्शी और साफ बनाने के लिए जरूरी है।
SIR प्रक्रिया क्या है और क्यों बना विवाद
SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मतदाता सूची की गहराई से जांच की जाती है। इसका मकसद डुप्लीकेट नाम हटाना, गलत एंट्री ठीक करना और अपात्र लोगों को सूची से बाहर करना होता है। चुनाव आयोग समय-समय पर यह प्रक्रिया चलाता है ताकि चुनाव निष्पक्ष तरीके से हो सकें।
लेकिन बंगाल में इसे लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ममता बनर्जी का कहना है कि यह प्रक्रिया अचानक और सख्त नियमों के साथ लागू की गई है। उनके मुताबिक इससे आम लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और कई असली मतदाताओं के नाम सूची से हटने का खतरा है।
सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की याचिका
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए मांग की है कि बंगाल में चल रही SIR प्रक्रिया को रद्द किया जाए। उनका कहना है कि 2026 के विधानसभा चुनाव मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर ही कराए जाएं। उन्होंने कोर्ट में यह भी कहा कि मतदाता सूची में छोटे-मोटे अंतर जैसे नाम की स्पेलिंग या उम्र में हल्के फर्क के आधार पर लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं। इससे आम जनता में डर और भ्रम का माहौल बन रहा है।
ममता बनर्जी ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि जिन मामलों में सिर्फ तकनीकी गलती है, उन्हें स्वतः ठीक किया जाए और लोगों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर न किया जाए।
चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे बड़ी संख्या में लोगों को मतदान अधिकार से वंचित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के दौरान हजारों माइक्रो ऑब्जर्वर तैनात किए गए हैं, जिनकी भूमिका और अधिकार स्पष्ट नहीं हैं। उनके अनुसार इससे प्रशासनिक प्रक्रिया में भ्रम पैदा हो रहा है और आधिकारिक अधिकारियों की भूमिका कमजोर हो रही है।
आम जनता पर असर को लेकर चिंता
ममता बनर्जी का कहना है कि इस प्रक्रिया का सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, महिलाओं और गरीब वर्ग पर पड़ सकता है। कई महिलाएं शादी के बाद अपना सरनेम बदल लेती हैं, जिससे रिकॉर्ड मिलान में दिक्कत आती है। इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में दस्तावेजों की कमी भी बड़ी समस्या बन सकती है। उनका दावा है कि इस प्रक्रिया के कारण कई लोगों को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा है।
चुनाव से पहले बढ़ा राजनीतिक तनाव
बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में SIR विवाद ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। तृणमूल कांग्रेस इसे मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश बता रही है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया है और इसका मकसद चुनाव को निष्पक्ष बनाना है।
खुद कोर्ट में पेश होने की तैयारी
इस मामले की खास बात यह है कि ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखने की तैयारी कर रही हैं। अगर ऐसा होता है तो यह काफी दुर्लभ स्थिति होगी, क्योंकि आम तौर पर मुख्यमंत्री खुद कोर्ट में पेश होकर बहस नहीं करते। ममता का कहना है कि वह इस मामले से जुड़ी हर जानकारी रखती हैं और जनता की परेशानियों को बेहतर तरीके से अदालत के सामने रख सकती हैं।
लोकतंत्र और मतदाता अधिकार पर बड़ा सवाल
यह विवाद केवल बंगाल तक सीमित नहीं है। इससे देशभर में मतदाता सूची की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर चर्चा शुरू हो गई है। अगर अदालत इस मामले में कोई बड़ा फैसला देती है, तो उसका असर अन्य राज्यों में भी देखने को मिल सकता है। चुनावी प्रक्रिया में सुधार और मतदाता अधिकारों की सुरक्षा को लेकर यह मामला अहम माना जा रहा है।
आगे क्या हो सकता है
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हुई है। अदालत का फैसला यह तय करेगा कि बंगाल में चुनाव किस मतदाता सूची के आधार पर होंगे और SIR प्रक्रिया जारी रहेगी या नहीं। इस मामले का असर केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी पारदर्शिता के भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।
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