ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव का असर अब भारत में भी दिखाई देने लगा है। देश के कई हिस्सों में एलपीजी गैस की कमी की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे होटल, रेस्टोरेंट और उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। इस मुद्दे पर शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है और आरोप लगाया है कि सरकार ने संसद में गैस स्टॉक को लेकर झूठ बोला था। वहीं दूसरी ओर, स्थिति को संभालने के लिए केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA) लागू करते हुए रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल यूनिट्स को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
प्रियंका चतुर्वेदी ने सरकार को घेरा
राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि संसद में सरकार ने दावा किया था कि देश में गैस का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और किसी तरह की समस्या आने पर सरकार स्थिति को संभालने में सक्षम है। लेकिन अब जमीनी हालात इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश के कई शहरों में गैस की भारी कमी देखने को मिल रही है। पुणे के श्मशान घाट से लेकर मुंबई और बेंगलुरु के होटल-रेस्टोरेंट तक हर जगह गैस की किल्लत की खबरें सामने आ रही हैं।
प्रियंका चतुर्वेदी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह स्थिति दिखाती है कि सरकार बिना तैयारी के काम कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करती है, जबकि आम जनता को असली परेशानी झेलनी पड़ रही है।
गैस की कमी से होटल और रेस्टोरेंट प्रभावित
कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कमी का सबसे ज्यादा असर होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर पर पड़ा है। इंडियन होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन (आहार) ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है।
आहार के मुताबिक कमर्शियल सिलेंडर की भारी कमी के कारण करीब 20 प्रतिशत होटल और रेस्टोरेंट को अपना संचालन बंद करना पड़ा है। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर अगले 72 घंटों के भीतर गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो मुंबई के लगभग 50 प्रतिशत रेस्टोरेंट बंद होने की स्थिति में पहुंच सकते हैं।
उद्योगों पर भी पड़ रहा असर
गैस संकट का असर केवल होटल-रेस्टोरेंट तक सीमित नहीं है, बल्कि औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसकी मार दिखाई देने लगी है। महाराष्ट्र के नासिक जिले के अंबड और सातपुर एमआईडीसी क्षेत्रों में गैस की कमी के कारण कई उद्योगों का काम प्रभावित हो रहा है।
अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि गैस आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई तो लगभग 1200 छोटे और बड़े उद्योगों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। इससे उत्पादन और रोजगार दोनों प्रभावित होने की आशंका है।
अंतिम संस्कार सेवाएं भी प्रभावित
गैस संकट का असर अब बुनियादी सेवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। पुणे नगर निगम ने पेट्रोलियम मंत्रालय के निर्देश के बाद गैस आधारित श्मशान घाटों को अस्थायी रूप से बंद करने का फैसला लिया है।
पुणे में कुल 27 श्मशान घाट हैं, जिनमें से 18 में एलपीजी गैस का इस्तेमाल किया जाता है। घरेलू गैस की उपलब्धता को प्राथमिकता देने के लिए इन श्मशान घाटों को फिलहाल बंद किया गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा संकट
विशेषज्ञों के अनुसार इस गैस संकट का मुख्य कारण मध्य पूर्व में बढ़ता युद्ध तनाव है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हो गई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में से एक है। भारत भी अपनी एलपीजी गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है। टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण गैस आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हुई है।
घबराहट में बढ़ी सिलेंडर बुकिंग
अधिकारियों के अनुसार युद्ध और सप्लाई बाधित होने की आशंका के कारण लोगों में घबराहट फैल गई है। इसी वजह से बड़ी संख्या में लोगों ने समय से पहले गैस सिलेंडर बुक कराना शुरू कर दिया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक घबराहट में की गई बुकिंग के कारण एलपीजी की मांग में लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग के बीच न्यूनतम अंतराल 21 दिनों से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम केवल स्टॉक और इन्वेंट्री को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने के लिए उठाया गया है।
सरकार का दावा – पर्याप्त है गैस
हालांकि अधिकारियों का कहना है कि देश में एलपीजी की पर्याप्त उपलब्धता है और घबराने की कोई जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में एक परिवार साल में औसतन 7 से 8 सिलेंडर ही इस्तेमाल करता है और आम तौर पर छह हफ्तों से पहले नए सिलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती।
फिलहाल सरकार उत्पादन बढ़ाने और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, लेकिन विपक्ष इस मुद्दे को लेकर लगातार सरकार को घेर रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है।
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