ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का नाम आज एक बड़े और प्रभावशाली नेता के रूप में सामने आया है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा। यह यात्रा कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव, गठबंधनों और रणनीतिक फैसलों से होकर गुजरी है।
विरासत में मिली राजनीति की शुरुआत
सम्राट चौधरी का राजनीति से जुड़ाव कोई अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह उन्हें विरासत में मिला। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार के जाने-माने नेता रहे हैं और सात बार विधायक चुने गए। इसी राजनीतिक माहौल में सम्राट चौधरी ने 1990 के दशक में अपने करियर की शुरुआत की। उस दौर में बिहार की राजनीति सामाजिक समीकरणों और पिछड़ा वर्ग की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती थी, जहां उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनानी शुरू की।
लालू यादव के साथ ‘राजनीतिक प्रशिक्षण’
सम्राट चौधरी का शुरुआती राजनीतिक जीवन लालू प्रसाद यादव के साथ जुड़ा रहा। 1999 में, जब बिहार में लालू यादव का प्रभाव चरम पर था और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं, तब सम्राट चौधरी पहली बार मंत्री बने। वे उस समय बिहार के सबसे युवा मंत्रियों में शामिल थे। हालांकि, उम्र से जुड़े विवादों के चलते उन्हें इस्तीफा भी देना पड़ा। लेकिन यह दौर उनके लिए सीखने का समय था।
लालू यादव के साथ रहते हुए उन्होंने सामाजिक समीकरण, जातीय राजनीति और जनाधार बनाने की बारीकियां समझीं। यही अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की मजबूत नींव बना।
नीतीश कुमार के साथ नया अध्याय
समय के साथ सम्राट चौधरी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ीं और उन्होंने 2014 में आरजेडी से अलग होकर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू का दामन थाम लिया। नीतीश कुमार के साथ उन्होंने सरकार में अहम भूमिका निभाई और नगर विकास एवं आवास मंत्री बने।
इस दौरान उन्होंने ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) सामाजिक समीकरण को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन राजनीति में स्थायित्व कम ही देखने को मिलता है। कुछ साल बाद उनका जेडीयू से भी मोहभंग हो गया और उन्होंने नई दिशा की तलाश शुरू कर दी।
बीजेपी में एंट्री और नई पहचान
2018 में सम्राट चौधरी ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थाम लिया। यह उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। बीजेपी में उनकी आक्रामक शैली और संगठनात्मक क्षमता को पहचान मिली। उन्हें पहले प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया और बाद में 2023 में बिहार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
इसी दौरान उनका ‘मुरेठा’ (साफा) बांधने का संकल्प काफी चर्चित रहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक बिहार में बीजेपी की सरकार नहीं बनेगी, वे इसे नहीं खोलेंगे।
एनडीए में वापसी और डिप्टी सीएम का सफर
जनवरी 2024 में बिहार की राजनीति ने एक और बड़ा मोड़ लिया, जब नीतीश कुमार ने फिर से एनडीए का साथ लिया। नई सरकार में सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने वित्त और गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। 2025 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने तारापुर सीट से बड़ी जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ और लोकप्रियता को मजबूत किया।
मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने का सफर
2026 में जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और राज्यसभा के लिए चुने गए, तब बीजेपी ने सम्राट चौधरी पर भरोसा जताया। उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया और अब वे बिहार के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। यह न सिर्फ उनके लिए, बल्कि बीजेपी के लिए भी ऐतिहासिक क्षण है।
प्रमुख उपलब्धियां एक नजर में
• 1990 में राजनीति में सक्रिय शुरुआत
• 1999 में मात्र 31 साल की उम्र में मंत्री बने
• परबत्ता सीट से कई बार विधायक
• 2014 में जेडीयू सरकार में मंत्री
• 2018 में बीजेपी में शामिल
• 2023 में बिहार बीजेपी अध्यक्ष बने
• 2024 में डिप्टी सीएम बने
• 2026 में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे
बिहार में बीजेपी का नया दौर
बिहार के इतिहास में यह पहली बार है जब बीजेपी का कोई नेता मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। इससे पहले बीजेपी हमेशा सहयोगी भूमिका में रही थी। अब सम्राट चौधरी के नेतृत्व में पार्टी ‘लीडिंग रोल’ में आ गई है। यह बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है।
आगे की चुनौतियां
हालांकि मुख्यमंत्री बनना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। सम्राट चौधरी को नीतीश कुमार जैसे अनुभवी नेता की जगह लेनी है, जिनका प्रशासनिक अनुभव और जनाधार मजबूत रहा है। बिहार की जनता को अब नई सरकार से विकास, रोजगार और बेहतर शासन की उम्मीदें हैं।
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर यह साबित करता है कि राजनीति में समय के साथ खुद को ढालना और सही मौके पर सही निर्णय लेना कितना महत्वपूर्ण होता है। लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार और फिर बीजेपी तक का उनका सफर सिर्फ दल बदल की कहानी नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति का आईना भी है।
अब जब वे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, तो पूरे राज्य की नजरें उनके फैसलों और नेतृत्व पर टिकी हुई हैं। आने वाला समय ही बताएगा कि वे इन उम्मीदों पर कितना खरे उतरते हैं।
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